लोकतंत्र आज की दुनिया का आदर्श है। बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था इसके मूल में है। लेकिन इस व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं। कई ऐसी बातें हैं, जिनका निर्धारण बहुमत से नहीं होता है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में ऐसे कई बुद्धिजीवी हैं जो बहुमत को ही लोकतंत्र का पर्यायवाची मान बैठे हैं। श्री प्रशांत भूषण भी उन्हीं में से एक हैं। लोकतंत्र की अपनी समझ के अनुसार उन्हें लगता है कि जम्मू कश्मीर में यदि जनता भारत के साथ नहीं रहना चाहती तो उसे देश से अलग होने देना चाहिए। वहां की जनता की राय जानने के लिए वे जनमत संग्रह करवाने की बात करते हैं।
प्रशांत भूषण जैसे लोगों को यह बताने और समझाने की जरूरत है कि राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे हमेशा बहुमत से नहीं तय किए जाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में जब फ्रांस की संसद ने हिटलर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, तो वहां से दूर ब्रिटेन में बैठे चार्ल्स डिगाल ने घोषणा की कि वह फ्रांसीसी संसद के निर्णय को नहीं मानता। उसने स्वतंत्रमना फ्रांसीसियों को इकट्ठा किया और अपने देश की सरकार के खिलाफ ही संघर्ष किया। क्या चार्ल्स डिगाल का निर्णय अलोकतांत्रिक था, ऐसा सवाल उठाना बचकाना कहा जाएगा, क्योंकि उस समय प्रत्येक फ्रांसीसी के सामने राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न खड़ा हो गया था। इसी तरह अमेरिका में दास प्रथा के मुद्दे पर गृहयुद्ध लड़कर अब्राहम लिंकन ने यह साफ कर दिया कि जब बात देश के अस्तित्व की हो तो लोकमत को सर्वोपरि नहीं माना जा सकता।
प्रशांत भूषण एक जाने-माने वकील हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि हमारे देश का लोकतंत्र यहां के संविधान के आधार पर चलता है और हमारा संविधान राष्ट्रीय एकता, अखंडता और प्रभुसत्ता पर सौदेबाजी की इजाजत किसी सरकार को नहीं देता। यदि कोई सरकार भारत के अस्तित्व के बारे में सौदेबाजी या समझौता करती है, तो वह स्वयं अवैध मानी जाएगी। कश्मीर के मुद्दे पर यदि कभी जनमत संग्रह की नौबत आई तो उसमें केवल जम्मू कश्मीर के लोग ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता को शामिल करना होगा। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उस पर निर्णय लेने का अधिकार जितना कश्मीर के लोगों को है, उतना ही कन्याकुमारी के या अन्य स्थानों के लोगों को भी है।
देश के भीतर जो बुद्धीजीवी लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर कश्मीर में जनमतसंग्रह की बात करते हैं, उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि साम्राज्यवादी और विस्तारवादी ताकतें अपने निहित स्वार्थों के लिए देशों को तोड़ने की जुगत में हमेशा लगी रहती हैं। इस काम में ‘आत्मनिर्णय’ का शगूफा उनके बड़े काम आता है। बौद्धिक विमर्श के नाम पर ऐसे विषय बड़ी चालाकी से लोगों के मन मष्तिष्क में डाल दिए जाते हैं। इसलिए तमाम बुद्धिजीवियों से मेरा आग्रह है कि वे राष्ट्रीय एकता और अखंडता से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अकादमिक बहस न चलाएं। क्योंकि इस प्रकार की बहस से राष्ट्रीय मनोबल में गिरावट आती है और हमारे अंतरविरोध बढ़ जाते हैं।
कश्मीर के मुद्दे पर प्रशांत भूषण ने जो भी कहा, वह गैर जिम्मेदाराना है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्होंने इस देश के करोड़ों लोगों की भावना को आहत किया है। इसके बावजूद उनका विरोध करने के लिए हिंसा और मारपीट का आश्रय लेना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। प्रशांत भूषण की स्थापना से सौ प्रतिशत असहमत होने के बावजूद उनके साथ किए गए व्यवहार की मैं घोर निंदा करता हूं।
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हमारा देश विभिन्न राज्यों में विभाजित अवश्य है पर सांस्कृतिक दृष्टि से वह एक है …!!!
हम सभी एक ही संस्कृति के प्रवाह में बह रहे हैं..!!
राजनितिक दलों की संकीर्ण राजनीती, सस्ती लोकप्रियता, सिर्फ वोट की लालसा , लीग से हट कर लिखने के लिए बुद्धजीवियों का अनावश्यक बुद्धि विलास बाटने की कोशिश करता दीखता है.
अंततोगत्वा अगर राजनीती ने अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं किया तो संस्कृति को ही सेतु बनाना होगा ..!!