सियासी दलों का भटकाव

by admin on October 29, 2010

के एन गोविंदाचार्य 

बिहार की राजधानी पटना से सटे एक जगह के रहने वाले और अच्छी शिक्षा हासिल करने वाले एक सज्जन को लगता है कि भाजपा की कार्यपद्धति को बदला जा सकता है। इस सज्जन का सही नाम लेना यहां ठीक नहीं होगा। इसलिए सुविधा के नाते इनका नाम अनुज मान लेते हैं। इस कार्यकर्ता की इच्छा और जज्बे को देखते हुए इसे भाजपा के एक प्रकोष्ठ में कोई काम दे दिया गया है।

 अनुज अकेले ऐसे कार्यकर्ता नहीं हैं जिन्हें यह लगता है कि मौजूदा भाजपा को वापस मूल्यों और मुद्दों पर वापस लाकर इस राजनीतिक तंत्र के जरिए कोई सकारात्मक बदलाव किया जा सकता है। जमीनी स्तर पर अनुज की तरह हजारों कार्यकर्ता इस भावना के साथ अब भी जी रहे हैं। पर वे नेतृत्व और दिल्ली की स्थितियों से गाफिल मालूम पड़ते हैं।

दरअसल, राजनीतिक दलों का आकलन पांच बातों पर होता है। ये हैं- प्रेरणा, विचारधारा, कार्यपद्धति, व्यवहार और आचरण। इन पांच बातों को सही तरह से किसी भी दल में लागू करने के लिए सबसे जरूरी है आत्मविलोपन। अगर किसी दल में इसका अभाव हो जाता है तो वहां गड़बड़ियां स्वाभाविक हैं। वहीं अगर कोई दल इन पांच बातों को सही और सफल ढंग से साध लेता है तो वह स्वाभाविक तौर पर सामाजिक बदलाव का औजार बन जाता है।

पर दुर्भाग्य से आज के ज्यादातर दलों में इसका अभाव दिखता है। भाजपा भी इसका अपवाद नहीं है। जिस दल में इन बातों का अभाव हो जाए उसका किसी राष्ट्रीय महत्व के लक्ष्य को पूरा करने में कोई उपयोग नहीं रह जाता। ऐसे दल तो एक तरह से देखा जाए तो आर्थिक और सामाजिक हैसियत बढ़ाने का जरिया बनकर रह जाते हैं।

देश के सभी दलों को अगर देखा जाए तो भाजपा और वाम दलों से ही सामाजिक बदलाव की मुहिम और राष्ट्र को सही दिशा में ले जाने की उम्मीद बंधती थी। इसमें से भी भारतीय जन और भारतीयता से जुड़ाव के कारण संघ परिवार से ज्यादा उम्मीद थी। पर ये दोनों दल भगवा और लाल कांग्रेस में तब्दील होकर रह गए हैं।

इसमें भाजपा का भटकाव सबसे ज्यादा हताशा पैदा करने वाला है। भाजपा में नीचे यानी कार्यकर्ता स्तर पर देखने पर पता चलता है कि वहां अब भी देववाद और आदर्शवाद मजबूती से बना हुआ है। वहीं ऊपर के स्तर पर स्वार्थ, सत्ता और अहंकार का टकराव आए दिन दिखता रहता है। कहा जा सकता है कि स्वार्थ, सत्ता और अहंकार के खेल में जुटे लोगों के लक्ष्य और दिशा सामाजिक न होकर व्यक्तिगत हो गए हैं।

नेताओं के व्यावसायिक हित नेताओं पर अब हावी हो चले हैं। बेशुमार दौलत और बेनामी संपत्तियों की सुरक्षा, नेताओं की आवश्यकता बन चुकी है। यह तो एक अंतहिन परिणाम की हविश मात्र है। ऐसे में नेता राजनीति का अपने दौलत की रक्षा के लिए कवच के नाते इस्तमेाला करें यह लाजिमी है। बेनामी संपत्तियां हाथ से न निकल जाएं इसके लिए राजनैतिक अधिकार नेताओं की जरूरत बन जाते हैं।

आर्थिक आरे राजनैतिक हित का यह घालमेेल वंशवाद को जन्म देता है और उसे पुख्ता करता है। इसलिए आर्थिक और राजनैतिक विरासत परिवार में बनी रहे, ये अब राजनेताओं की जरूरत बन चुकी है। इसलिए भाजपा समेत प्रमुख राजनैतिक दलों में वंशवाद जड़ जमा चुका है। इसकी छटा प्रदेशों में और कुछ-कुछ केंद्र में भी दिखने लगी है।

ऐसे समय में स्वर्गीय नानाजी देशमुख का अनुभव काम आता है। एक बार राज्यसभा चुनाव में जब एक उद्योगपति के उत्तर प्रदेश से चुनाव मैदान में उतरने की बात सामने आई तो नानाजी ने लखनऊ में छात्रों और नौजवानरों को प्रेरणा दी कि वे राजनीति में बढ़ते धनबल के प्रभाव की रोकथाम के लिए सामने आएं और छात्रों और नौजवानों का वह प्रयोग सफल भी रहा।

देश के सभी प्रमुख औद्योगिक घरानों से नानाजी का रसोई तक संपर्क था और कालाधन राजनीति में अपरिहार्य रहने के कारण नानाजी मजबूरन उनसे चंदा लेते थे मगर उन्होंने एक परहेज हमेशा पाले रखा। उन्होंने कभी किसी उद्योगपति को पार्टी का प्राथमिक सदस्य भी नहीं बनाया। हां, घरेलू रिश्ता जरूर बरकरार रखा। आज उद्योग घरानों के लोग राजनीति में गहरी पैठ जमा चुके हैं और राजनैतिक दलों को जेब में रखने की डींग भी हांकते रहते हैं। भाजपा उसमें अपवाद नहीं है।

भाजपा का सामान्य कार्यकर्ता जहां देश के बारे में सपना पाले हुए है वहीं भाजपा नेतृत्व का अधिसंख्य हिस्सा साजिश, तिकड़म और चापलूसी की कार्यपद्धति अपनाकर खुद के लिए महत्वकांक्षी सपने पाल रहा है और घरेलू महाभारत कर रहा है। अनेक उद्योग घरानों के हित संरक्षण में जुटे नेता उन उद्योगपतियों के मोहरों के नाते वर्चस्व स्थापना की गुटबाजी बढ़ा रहे हैं और एक दूसरे पर खबरें प्लांट कराने का आरोप जड़ रहे हैं।

राम मनोहर लोहिया ने बहुत पहले कहा था कि सुधरो या टूटो। इससे साफ है कि टूट की परवाह किए बिना अज्ञान में कूदना ही परिष्कार की पूर्व शर्त है। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह साहस भी सब में नहीं होता। पर राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य के साथ निकले लोगों और दलों में तो सार्वजनिक हित को सर्वोपरी रखते हुए ऐसा करने का साहस होना ही चाहिए।

सही मायने में देखा जाए तो आज की स्थिति का तकाजा यही है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि क्या अनुज जैसे कार्यकर्ता इस बात को समझ पाएंगे? अभी की स्थिति पर निगाह दौड़ाई जाए तो साफ तौर पर यह अनुभव होगा कि निहित स्वार्थों को साधने के लिए यथास्थिति को बरकरार रखने का जोर हर ओर है। इसके पक्षधर लोग राष्ट्र निर्माण में टूट-फूट को खतरा बताएंगे और यथास्थिति बरकरार रखेंगे। इसके अलावा अंदर के प्रहार की स्थिति को भी भोथरा बनाए रखेंगे।

ऐसे में स्वाभाविक तौर पर जड़ता पैदा होगी और यह आखिरकार सड़ांध में बदलेगी। मूल्यों और मुद्दों से भटके इन जड़ दलों की सरकार भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान बना रही है। वहीं दूसरी तरफ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच की दीवार दिनोंदिन और मजबूत व चौड़ी होती जा रही है। बदहाली का आलम यह है कि आज नेताओं को उनके द्वारा बुनी गई छवि के जरिए ही कार्यकर्ता जान पा रहे हैं। जमीनी स्तर का कार्यकर्ता अपने नेता के व्यवहार, आचरण और प्राथमिकता से गाफिल होकर जी-जान लगाए हुए है।

अनुज सरीखे कार्यकर्ताओं का सपना साकार हो इसके लिए पैबंद नहीं भगीरथ साधना की आवश्यकता है जिससे भारतपरस्त और गरीबपरस्त राजनैतिक वज्र गढ़ा जा सके। इसके लिए दधीचियों का अस्थिदान महत्वकांक्षी नेताओं की खुराक न बने इसका ध्यान आज के दधीचियों को ही रखना पड़ेगा।

{ 3 comments… read them below or add one }

Paritosh Kumar November 8, 2010 at 7:14 pm

Each point is absolutely correct and important. I also agree with anuj’s thoughts and i have regards for him. His thoughts can be possible in reality. But for that leader like govindacharya should be in active politics.

varuchi sachdev December 24, 2010 at 1:08 pm

what I feel is that a few corrupt leaders have taken over the BJP and they are misusing the name of nationalinsm to attract votes the same way congress uses the name of minorities but never works for their benefits. BJP too has not done anything better than congress. I dont mind naming late Mr pramod mahajan as the main person responsible to have corrupted the BJP. Ananth Kumar’s swiss bank details have been disclosed in radia case.

kunal baikunth singh April 15, 2011 at 1:20 am

thank you govindacharya jee for giving us well exprenced & true thout.i am very much interested in politics.i want to do something for rastra nirman.when ever i will join active politics or political party i wll remember yours this witeup.jaii hind.kunal

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