के. एन. गोविंदाचार्य
लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होती है कि इस रिपोर्ट के लिए 17 साल! यदि इतनी हड़बड़ी, लापरवाही, कपोलकल्पना और पूर्वाग्रह के साथ यह रिपोर्ट तैयार करनी थी तो इसके लिए 17 दिन ही काफी थे। यह एक जांच रिपोर्ट कम उपन्यास ज्यादा है।
इसे तैयार करने में देश का 8 करोड़ रुपया खर्च हुआ है, जानकर पीड़ा होती है। इस रिपोर्ट से एक बात और साफ हो गयी कि किसी जस्टिस से जांच करवाने पर जस्टिस ही होगा, यह जरूरी नहीं है। जिस रिपोर्ट को 3 महीने में तैयार हो जाना था, उसे तैयार करने में 17 साल कैसे लगे, यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।
इन 17 वर्षों मे कई सरकारें आई-गयीं जिनमें भाजपा की भी सरकार थी, पर सभी ने बिना समझे-बूझे आयोग का कार्यकाल बढ़ाया। सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति अपना काम ठीक ढंग से कर रहा है या नहीं, क्या इसे सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? अभी मुख्य रूप से उन 68 नामों को लेकर चर्चा हो रही है, जिन्हें आयोग ने 6 दिसंबर की घटना के लिए जिम्मेदार माना है।
ये नाम कितनी हड़बड़ी और लापरवाही के साथ जुटाए गए हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देवराहा बाबा का नाम भी है जिनकी मृत्यु 6 दिसंबर की घटना से बहुत पहले ही हो चुकी थी। ‘दोषियों’ की जो लिस्ट आयोग ने अपनी रपट में दी है उसमें कई लोगों के नाम दो-दो जगह दिए गए हैं। बद्री प्रसाद तोसनीवाल का नाम तो तीन बार दिया गया है।
इसके अलावा बारह नाम ऐसे हैं जिनका उल्लेख दो बार किया गया है। इस सूची में एक जगह लिखा हुआ है एडीशनल डीजीपी इंटेलिजेंस। अब सवाल उठता है कि सत्रह साल में जो आयोग एडीशनल डीजीपी इंटेलिजेंस का नाम नहीं पता कर पाया और आरोपी लोगों की सूची में नामों के दुहराव को नहीं ठीक कर पाया उससे इतने बड़े मसले की निष्पक्ष और सही जांच की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है?
आयोग का गठन करते समय इसे कानूनी रूप से निर्देश दिया गया था कि किसी ऐसे व्यक्ति को दोषी न ठहराया जाए जिससे पूछताछ न की गयी हो। लेकिन आयोग ने मेरे सहित कई लोगों को स्पष्टीकरण का कोई मौका दिए बिना ही दोषी ठहरा दिया है। घटना हुई 6 दिसंबर 1992 को जबकि मैं अप्रैल 1992 से लेकर अप्रैल 1993 तक तमिलनाडु में भाजपा का काम देख रहा था।
राममंदिर आंदोलन में मुझसे कई गुना ज्यादा सक्रिय तो सरदार बूटा सिंह थे। उनका नाम तो आयोग ने कहीं नहीं लिया। इसके अलावा राजीव गांधी का नाम देना भी आयोग भूल गया। याद रहे कि 1991 में राजीव गांधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या से ही की थी। ताला भी उन्होंने ही खुलवाया था। इसलिए असली ‘दोषी’ तो उन्हें माना जाना चाहिए। पर आयोग इन तथ्यों से जानबूझ कर गाफिल बना रहा और अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर लोगों का नाम इस रिपोर्ट में डालता गया।
नरसिम्हा राव के बारे में भी आयोग की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। राजीव गांधी और नरसिम्हा राव को छोड़कर आयोग ने गुलजारी लाल नंदा पर निशाना साध लिया है। उसका कहना है कि गुलजारी लाल नंदा ने संघ नेताओं के साथ मिलकर अपने निहित स्वार्थों के लिए झगड़े को हवा दी। आयोग यह भूल गया कि गुलजारी लाल नंदा देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रह चुके थे और 1971 के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था।
रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। 17 साल बाद आई रिपोर्ट में इस तरह की बे-सिर पैर की बातें होंगी तो आयोग की नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। इस रिपोर्ट में एक जगह यह लिखा गया है कि मुस्लिम संगठनों और अन्य राजनीतिक संगठनों ने जोर-जोर से विरोध कर मंदिर आंदोलन को बल दिया।
इस बात की तो आयोग ने पड़ताल ही नहीं की कि आखिर क्यों और किस आधार पर इन संगठनों ने जोर-जोर से विरोध किया? आयोग के दोहरे रवैये का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राम जन्म भूमि आंदोलन के लोगों की छोटी-छोटी बातों से आयोग ने अपने मन और पूर्वाग्रह के हिसाब से आशय निकाला लेकिन दूसरों के बातों की अनदेखी की गई।
आयोग ने मंदिर आंदोलन के लोगों के बारे में यह लिखा है कि इस आंदोलन के लोग तो कहते कुछ थे लेकिन उसका आशय कुछ होता था। वहीं दूसरी तरफ आयोग को उस नेता का वह बयान याद नहीं आता जिसमें उन्होंने कहा था कि राम जन्म भूमि पर तो शौचालय बना देना चाहिए। आयोग ने कम्युनिस्टों द्वारा उस समय की जा रही जहरीली टिप्पणियों की भी अनदेखी की है। इन बातों को रिपोर्ट में जगह ही नहीं दी गई है।
आयोग ने पुलिस अधिकारियों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा वहां की स्थिति के हिसाब से लिए गए फैसले को भी एक खास इरादे के तहत लिया गया फैसला बताया है। जबकि आयोग ने ऐसा साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया है। इन अधिकारियों की क्षमता पर तो सवालिया निशान लगाया जा सकता था लेकिन उनकी मंशा पर सवालिया निशान लगाना आयोग के पक्षपाती रवैये को दर्शाता है।
आयोग ने कहा है कि किशोर उम्र के कारसेवक के साथ एक जत्था सबसे पहले कूदा और चढ़ा था। आयोग की अगंभीरता का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि सत्रह साल की जांच के बाद भी उसे यह पता नहीं लगा कि किशोर उम्र के वे कारसेवक कौन थे? आयोग ने 6 दिसंबर की घटना को पूर्वनियोजित बताया है लेकिन आयोग ने अपनी रपट में कहीं भी इस बात के लिए कोई सबूत ही नहीं दिया है।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई बातों का उल्लेख किया है, लेकिन 1990 का विवरण नहीं दिया है। अयोध्या में 30 अक्टूबर 1990 को भी कारसेवा हुई थी। उस वक्त के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यह बयान दिया था कि ढांचे पर परिंदा पर नहीं मार सकता। ऐसे बयानों के जरिए हिंदू समाज की भावनाओं के साथ किस तरह से खिलवाड़ किया गया, इसका कोई विवरण आयोग ने नहीं दिया है।
जवाब तो इस सवाल का भी ढूंढा जाना चाहिए था कि आखिर 6 दिसंबर की घटना हुई ही क्यों? दरअसल, 6 दिसंबर की घटना को सत्ता-व्यवस्था द्वारा दबाई गई भावनाओं के उभार का नतीजा माना जा सकता है। उसे न तो शौर्य दिवस माना जा सकता है और न ही कलंक दिवस। अगर शौर्य दिवस ही मानना हो तो 30 अक्टूबर 1990 को माना जाना चाहिए। उस दिन मुलायम सिंह की धमकियों के बावजूद अयोध्या में कारसेवा हुई थी।
अगर कोई समझना चाहे तो 6 दिसंबर की घटना ने कई गंभीर और गहरे संदेश दिए हैं। जो लोग आंदोलनों का नेतृत्व करते हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि जनभावनाओं को उभारना जितना आसान होता है, उसे सार्थक दिशा देना उतना ही मुश्किल। इसी के साथ भारतीय राजनीति में चल रहे अल्पसंख्यकवाद के खतरे को भी 6 दिसंबर की घटना ने उजागर कर दिया।
मध्यकाल में हिन्दुओं पर विदेशी हमलावरों ने जो धार्मिक अत्याचार किए, उस पर मरहम लगाने का काम न तो मुस्लिम समुदाय ने किया और न ही सरकार ने। ऐसे में हिन्दू समाज के मन में वर्षों से दबा आक्रोश कब, कैसे और कहां फूटेगा, कोई नहीं जानता।
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govindji….
I had expected your reactions about Liberhan Commission findings, not through your web site but through the print and visual media. BJP didnt given any official comments on that. Sangh also kewep mum. VHP too. So I expected atleast your comments in public. Even in this post you have commented only on the misfindings oof the commission. You hv said nothing to justify our actions towards this goal. As always, in this occassion also our reactions were very less, low, and very late. We should learn from Christian and Muslim organisations, the way they reacts against any negative comments arises. Their reactions will be quick, prompt, harsh,and very powerfull. BJP may be afraid of loosing minority support. But why VHP? why we? I dont understand.
This is my humble opinion .
N.Ramachandran
09961486815
09037930019
It is of least imortance,what librahan has said. The main problem is that how the system will stand responsible, unless individual doesnot.
भ्रमित तन्त्र से क्यों करें, सही काम की आशा?
गलत ही होगा काम सब, बढते दुःख- निराशा.
बढते दुःख-निरासा, नियम यदि ना जानें.
संभव है सुधार-प्रयास को सार्थक मानें.
कह साधक सुलझेगी समस्या समझ-मन्त्र से.
सही की आशा क्यों करते हैं, भ्रमित तन्त्र से?
sahiasha.wordpress.com
Shri Govindacharya ji
Pranam.
I feel its high time you come out and take the central stage which is lying vacant since the demise of old BJP (real BJP). Country is lacking direction and really missing people like you in public life to give it right direction.
Govind ji,
Namaste!
I echo with views expressed by Manoj. It is high time that you come back in active politics and lead this country from the front. As a student, I had the privilege of interacting with you, and since then I have considered you an epitome of goodness, simplicity and sacrifice.
I would urge you to end your political sanyaas in the larger interest of this country, which is looking at you to provide your able leadership. Look at what this Italian “memsaheb” and her coterie has turned this country into! One one hand, this government can’t arrange two square meals for all but allows food grains to rot, and on the other hand, we are celebrating this 70000 crore “loot-fest”, some call it CWG 2010!
It took just one “Gandhi” to wake us up from our deep slumber, and you are our last hope.