सत्ता राजनीति की विवशताएं

by admin on November 17, 2009

केएन गोविंदाचार्य
राजनीति में सत्ता संपत्ति और सम्मान का गठजोड़ हो गया है। पार्टी संगठन के विकास के लिए अलग मापदंड अलग हैं और सत्ता संचालन के अलग। राजनीति में सत्ता और संगठन दोनों प्रमुख तत्व हैं। समाज सत्ता और सत्ता समाज को व्याप्ती है। संगठन समाज के छोटे हिस्से को व्याप्ते हैं।
सत्ता संचालन में  जन प्रतिनिधियों की पहुंच होती है। जन प्रतिनिधियों को सत्ता संचालन के स्थान पर पहुंचाने में संगठन और उसके कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका होती है। जन प्रतिनिधि बनने तक उम्मीदवारों का ज्यादा संबंध संगठन और कार्यकर्ताओं से होता है। पर जन प्रतिनिधि बनने के बाद उनका संबंध सत्ता से ज्यादा और संगठन से कम हो जाता है।
सत्ता में समाज के लिए प्रभावी एवं परिणामकारी विभागों का महत्व जन प्रतिनिधियों के लिए कम है। बजट की दृष्टि से मलाईदार विभागों का महत्व अधिक है। उदाहरण के तौर पर देखें तो मानव संसाधन मंत्रालय की तुलना पेट्रोलियम मंत्रालय और कोयला मंत्रालय का बजट अधिक होता है। संगठन के काम में बढऩे और जन प्रतिनिधि के सत्ता क्षेत्र में बढऩे के कारण अलग-अलग प्रकार के हैं।
सामान्य जन से संगठन का साबका चुनावों में ज्यादा पड़ता है। जन प्रतिनिधियों को चुनावी जीत के बाद सामान्य जन से ज्यादा काम पड़ता है। चुने जाने तक कार्यकर्ता संगठन की पहचान बने होते हैं। जीतने के बाद जन प्रतिनिधि जनता में संगठन की पहचान बनाते हैं। समाज में उनकी पूछ बढ़ जाती है। इस कारण जन प्रतिनिधि सामान्य कार्यकर्ता न रहकर विशिष्टï हो जाता है। इस वजह से कार्यकर्ता और जन प्रतिनिधि में मनोवैज्ञानिक दुराव आ जाता है।
चुनाव की प्रक्रिया और सत्ता संचालन की प्रक्रिया राजनैतिक दलों की प्रक्रिया से अलग होती है। संगठन में ध्येयवाद और आदर्शवाद अनुशासन की कसौटी होते हैं। इन दोनों कसौटियों की समझ और संतुलन बढ़ाना बहुत बड़ी समस्या और चुनौती है। इन्हीं बातों के बीच शंकर सिंह बघेला का उदाहरण याद आता है। संगठन के चुनाव में उन्होंने खुद अध्यक्ष बनने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की व्यूह रचना की थी। सदस्यता प्रभारी, चुनाव अधिकारी आदि के नियोजन में शुरू से निकटतम का सहारा लिया। अध्यक्ष बनने के बाद चुनाव में टिकट बांटने की जिम्मेदारी वाली चुनाव समिति का गठन अपने हिसाब से करवाया। अपने पसंद के लोगों को टिकट दिलाकर समानांतर धन वितरण के जरिए अनुकूल लोगों को जिताया। केशू भाई की सरकार बनने के कुछ महीनों बाद ही खजुराहो का खेल शुरू हुआ।
पिछले कुछ सालों में राजनीति पर धनबल का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। इसे कर्नाटक में भाजपा सरकार पर आए संकट के संदर्भ में देखा जा सकता है। कर्नाटक में बेल्लारी के रेड्डïी बंधुओं ने वही प्रक्रिया दुहराई है। विधानसभा चुनाव के साल भर पहले से  उन्होंने भाजपा के संगठन संचालन में पैसे से भरपूर मदद की। टिकट भी अपने पसंद के लोगों को दिलवाए। कई मामलों में कहा जाए तो उन्होंने टिकट खरीदे। प्रत्याशियों को हराने और जीतने में पैसे से मदद की। चुनाव के बाद निर्दलीय और कांग्रेसी विधायकों को खरीदने में पैसे से मदद की। वे मंत्रिमंडल और विभाग के आबंटन में भी प्रभावी रहे।
साल भर से वे इस योजना में लगे हुए थे कि ज्यों ही 40 विधायकों को अपने पक्ष में कर लेंगे, सत्ता पलट का खेल शुरू करेंगे। वैसा ही हुआ भी। भाजपा के लोगों ने सत्ता प्राप्ति के लिए येदियुरप्पा और अनंत कुमार में से येदियुरप्पा को प्रभावी बनाया। कभी पार्टी छोडऩे की धमकी देने वाले येदियुरप्पा ही संघ के लोगों के चहेते बन बैठे। सत्तासीन होने पर येदियुरप्पा ने संघ के लोगों को प्रसन्न करने की सफल कोशिश की। इसी प्रकार उन्होंने रेड्डïी बंधुओं को खुश रखने और लाभ पहुंचाने की जमकर कोशिश की लेकिन सत्ता स्वार्थियों के बीच नरम-गरम संबंध स्थायी हो ही नहीं सकते थे। यही वजह है कि कर्नाटक में भाजपा सरकार संकट में पड़ गई थी। यह संकट अभी अस्थायी तौर पर भले ही टल गया हो लेकिन आने वाले दिनों में सत्ता पलट का खेल वहां शुरू होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
जाहिर है कि कर्नाटक विवाद से भाजपा की प्रतिष्ठïा और मनोबल पर भी असर पड़ेगा। ऐसी समस्याओं के मूल में है कार्य पद्धति। संगठने के विकास और राजनीति के बीच बेमेलपन को समझकर समाधान की व्यवस्था न ढूंढ पाना आज भाजपा की घटी साख और घटते मनोबल का कारण है। 1996 के कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस तो सत्ता केंद्रित समूह भर रही है। भाजपा संघ के संगठनित डोर से चाहे-अनचाहे बंधी हुई है।

{ 2 comments… read them below or add one }

alok bhargava November 22, 2009 at 2:52 am

this article is very factfull and eyeopener for bjp . it describe successfully our current political culture. alok state president ,bjp gausewa cell ,m.p.

N.Ramachandran December 29, 2009 at 11:13 am

I strongly agree with the comments of Sri. Alok Bhargava. At the same time how many members, office bearers, and have got a habit of self evaluation? No body has. That why BJP faces more and more debaccles in all the fields. It was lost its credibility, public confidence and trust and their own self confidence. If once the self confidence of the grass root level workers is lost , then that organisation is good for nothing. That is what happened to BJP now. Ideological compromise for political and financial benefits will destory any organisation. So the only solution is that BJP leadership should dissolve the party. If they are not doing then Sangh has to do that. Otherwise such a time will come when national patriotric forces has to work against BJPas they are doing now against Cong I, CPM etc
N.Ramachandran
Kerala.

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