केएन गोविंदाचार्य
बस्तर में काम कर रहे जन संगठनों के लोगों से पिछले दिनों मुलाकात हुई। उन लोगों ने वहां के जमीनी हालात के बारे में जो बताया उससे नक्सलियों और वाम विचारधारा के दोहरेपन की झलक मिलती है। बस्तर में बड़े-बड़े उद्योग लग गए हैं। बड़े उद्योगपतियों को वहां लाने का काम राज्य सरकार ने किया है।
स्पोंज आयरन और इससे जुड़े उद्योगों की वजह से वहां प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ गया है। हालत यह है कि वहां जो गोभी पैदा हो रहा है, उसका रंग लाल हो गया है। लोग वहां खुले में भोजन नहीं कर सकते हैं। ऐसा करने पर उनके खाने का रंग तुरंत लाल हो जाता है। अभी प्रदूषण की वजह से वहां के लोगों को परेशानियां तो हो ही रही हैं लेकिन आने वाले दिनों में वहां की हालत और खराब होगी। तेजी से बढ़ते प्रदूषण की वजह से आने वाले समय में वहां के लोग तरह-तरह की बीमारियों का सामना करते हुए दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
हां, इस बात के लिए आश्चर्य और दुख भले ही जताया जा सकता है कि सरकार स्थिति की भयावहता के प्रति जान-बूझकर आंख बंद किए हुए है। यह सरकारी उदासीनता कई सत्ता का जन सामान्य के प्रति असंवेदनशीलता के स्तर के बढ़ते जाने की बात को साबित करती है। बस्तर के उदाहरण से एक बार फिर इस बात की पुष्टि हो गई है कि जनता के द्वारा और जनता के नाम पर चुनकर आने वाली सरकारें जनता की नुमाइंदगी करने का चाहे कितना भी राग अलापती हों लेकिन सही मायने में ये पूंजीपतियों के हितों को पोषित करने का काम कर रही हैं। पूंजीपतियों द्वारा मचाई जा रही अराजकता से अगर जनता को नुकसान भी हो रहा हो तो ये सरकारों पूंजीपतियों के साथ खड़ा होने को अपना राजधर्म मान रही हैं।
दरअसल, बस्तर में नक्सलियों का दोहरा चरित्र भी उजागर हो गया है। नक्सलियों ने अपना विस्तार ही व्यवस्था विरोध और पूंजीपतियों के विरोध के आधार पर किया है। पर बस्तर में नक्सली भी पूंजीपतियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वहां के लोगों का कहना है कि नक्सली पुलिस वालों और सरकारी संस्थाओं को निशाना तो बना रहे हैं लेकिन उद्योगपतियों के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि वहां उद्योगपतियों ने नक्सलियों से सांठगांठ कर ली है। वहां काम करने वाले लोग बता रहे हैं कि नक्सली नेताओं को इन उद्योगपतियों के द्वारा पैसा और तमाम तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। इस वजह से वहां के नक्सली उन उद्योगपतियों के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं जिनकी वजह से वहां की आम जनता को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
पर सबसे दुखद यह है कि इसके बावजूद ये नक्सली आम आदमी के हमदर्द होने का ढोंग रचते हैं। आदिवासियों के हित के नाम पर नक्सली अपना हित साध रहे हैं। सही मायने में कहा जाए तो बस्तर के लोग नक्सली हिंसा और सरकारी हिंसा, दोनों की मार झेल रहे हैं। यह सब पूंजीपतियों के हित सध पाएं, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है। साफ है कि अति वामपंथियों ने अपने नेतृत्व को थैलीशाहों के हाथ में गिरवी रख दिया है।
यह छत्तीसगढ़ की विडंबना ही है कि आदिवासियों के कल्याण के नाम पर इस राज्य का गठन हुआ था लेकिन आदिवासियों की उपेक्षा ही सबसे ज्यादा हो रही है। सरकार पूंजीपरस्तों की चाकरी करने में ही गर्व महसूस करती है और नक्सली हथियार के मद में इस कदर मस्त हैं कि उनके लिए आदिवासियों के सुख-दुख का कोई मोल नहीं रह गया है और वे अपनी ही निजी फायदे को साधने में मशगूल हैं।