सच्ची नहीं है ये सादगी

by admin on September 22, 2009

केएन गोविंदाचार्य
अभी जिस तरह से सत्ता में बैठे हुए खास लोग सादगी दिखा रहे हैं, वह आम लोगों के लिए बहुत महंगी पड़ रही है। सही मायने में देखा जाए तो सादगी के फेर में खर्च तो ज्यादा ही हो रहा है। दरअसल, जो लोग सादगी की बात करने वाले लोग ही वैसी नीतियों को बढ़ावा देने का काम भी कर रहे हैं जिसकी वजह सादगीपसंद लोगों का जीना मुहाल हो गया है। ये नीतियां तो आम लोगों को मुश्किल में डालने वाली बनाते हैं लेकिन बात सादगी की करती है। ये वही लोग हैं जिन्होंने पूंजीपरस्त और बाजारवादी नीतियां बनाईं।
इसका परिणाम यह हुआ कि दिखावे को ही समाज में प्रधानता मिलने लगी। जो लोग सादगी से रहते थें, उन्हें आउटडेटेड कहकर खारिज किया जाने लगा। नई आर्थिक नीतियों को लाने वाले लोग आज सादगी की बात कर रहे हैं। इन नीतियों ने पिछले 15 सालों में समाज को काफी बदल दिया है। इन नीतियों की वजह से उपयोग के बजाए उपभोग पर जोर बढ़ता गया। जाहिर है कि जब जोर उपयोग की जगह पर उपभोग पर होगा तो वहां से सादगी गायब हो जाएगी।
इन नीतियों ने बाजारवादी ताकतों को खुला खेल खेलने का मौका दिया। इन्होंने ऐसा माहौल तैयार किया जिसमें तड़क-भड़क के साथ रहने वाले और ब्रांडेड कपड़े पहनने वालों को आधुनिक माना जाने लगा। जो लोग सादगी के साथ और उपयोग आधारित जीवन जीते थे उन्हें गुजरे जमाने का कहकर खारिज किया जाने लगा। ऐसी नीतियों को परवान चढ़ाने वाले नेताओं के मुंह से सादगी की बात सुनकर उनके कथनी और करनी के फर्क का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सादगी की बात करने वाले लोग ही शिक्षा को आम तबके के बच्चे के लिए मुश्किल बनाते जा रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें कुपोषण से मर रहे बच्चों की चिंता नहीं है। ये वही लोग हैं जिनके लिए आम आदमी सिर्फ वोट पाने का जरिया मात्र है। इसके बावजूद ये सादगी की बात कर रहे हैं। ऐसा करके ये इस बात को साबित करना चाहते हैं कि ये ही सही मायने में आम लोगों के हमदर्द  हैं। पर सच तो यह है कि सादगी की बात करने वालों की सरकार सादगीपसंद आम तबके के लिए नहीं बल्कि हैसियतमंदों के लिए ही काम कर रही है। इसके बावजूद सत्ता में बैठे हुए लोग सादगी की बात कर रहे हैं तो इसे जनता के साथ छल ही कहा जा सकता है।
आम आदमी के साथ हमदर्दी का राग अलापने वाले ये स्वघोषित इन सादगीपसंद नेताओं के लिए यह एक सियासी लाभ पाने का जरिया बन गया है। इसके जरिए ये नेता राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। इन नेताओं के इस रवैये से जनहित तो नहीं सधेगा लेकिन राजनीतिक हित भले ही सध सकता है। सही मायने में जो सादगी पसंद होते हैं, वे इसका डंका नहीं बजाते। क्योंकि ऐसा करना भी सादगी के खिलाफ है। अभी भी कई ऐसा नेता हैं जो बेहद सादगी के साथ अपना जीवन गुजार रहे हैं। वे तो कभी मीडिया के सामने खुद की सादगी का ढोल नहीं बजाते हैं।
दरअसल, जो भी नेता सादगी की बात कर रहा है वह इस बात को जानता है कि अभी भी भारतीय राजनीति में साधन शुचिता और सादगी का महत्व है। इसलिए ही इस राजनीतिक पैतरे को अपनाया गया है। सही मायने में कहा जाए तो समाज में अभी भी सही और गलत का विवेक जिंदा है। यही वजह है कि ये नेता सियासी लाभ के लिए सादगी का सहारा ले रहे हैं। पर सही अर्थों में कहा जाए तो इनकी सादगी सच्ची नहीं है।

{ 2 comments… read them below or add one }

Vishal Bajpai September 26, 2009 at 1:56 pm

The prevalent habit to showoff, amongst people who hails from diverse spheres capable of communicating socially or politically either by virtue of their social status or appearance has led public in general to abstain from balanced lifestyle. This has caused an acute imbalance between individual aspirations and their capacity to acquire material benefits.

Todays political & corporate behemoth are actually munching and chomping behind fake austerity which i call “TYAG KA BHOG”.

Rakesh Singh October 27, 2009 at 5:57 pm

Simplicity is the latest fashion opted by some big brands of Indian politics to continue to make the innocent people fool. They have changed the meaning of simplicity according to their own compatibility and usefulness.

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