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	<title>K. N. GOVINDACHARYA &#124; के. एन. गोविन्दाचार्य</title>
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	<description>Hindutva Ideologue &#38; Former BJP Leader</description>
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		<title>सब कुछ बहुमत से नहीं तय होता</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Oct 2011 05:55:06 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[ प्रशांत भूषण एक जाने-माने वकील हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि हमारे देश का लोकतंत्र यहां के संविधान के आधार पर चलता है और हमारा संविधान राष्ट्रीय एकता, अखंडता और प्रभुसत्ता पर सौदेबाजी की इजाजत किसी सरकार को नहीं देता। यदि कोई सरकार भारत के अस्तित्व के बारे में सौदेबाजी या समझौता करती है, तो वह स्वयं अवैध मानी जाएगी। कश्मीर के मुद्दे पर यदि कभी जनमत संग्रह की नौबत आई तो उसमें केवल जम्मू कश्मीर के लोग ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता को शामिल करना होगा। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उस पर निर्णय लेने का अधिकार जितना कश्मीर के लोगों को है, उतना ही कन्याकुमारी के या अन्य स्थानों के लोगों को भी है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>लोकतंत्र आज की दुनिया का आदर्श है। बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था इसके मूल में है। लेकिन इस व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं। कई ऐसी बातें हैं, जिनका निर्धारण बहुमत से नहीं होता है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में ऐसे कई बुद्धिजीवी हैं जो बहुमत को ही लोकतंत्र का पर्यायवाची मान बैठे हैं। श्री प्रशांत भूषण भी उन्हीं में से एक हैं। लोकतंत्र की अपनी समझ के अनुसार उन्हें लगता है कि जम्मू कश्मीर में यदि जनता भारत के साथ नहीं रहना चाहती तो उसे देश से अलग होने देना चाहिए। वहां की जनता की राय जानने के लिए वे जनमत संग्रह करवाने की बात करते हैं।</p>
<p>प्रशांत भूषण जैसे लोगों को यह बताने और समझाने की जरूरत है कि राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे हमेशा बहुमत से नहीं तय किए जाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में जब फ्रांस की संसद ने हिटलर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, तो वहां से दूर ब्रिटेन में बैठे चार्ल्स डिगाल ने घोषणा की कि वह फ्रांसीसी संसद के निर्णय को नहीं मानता। उसने स्वतंत्रमना फ्रांसीसियों को इकट्ठा किया और अपने देश की सरकार के खिलाफ ही संघर्ष किया। क्या चार्ल्स डिगाल का निर्णय अलोकतांत्रिक था, ऐसा सवाल उठाना बचकाना कहा जाएगा, क्योंकि उस समय प्रत्येक फ्रांसीसी के सामने राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न खड़ा हो गया था। इसी तरह अमेरिका में दास प्रथा के मुद्दे पर गृहयुद्ध लड़कर अब्राहम लिंकन ने यह साफ कर दिया कि जब बात देश के अस्तित्व की हो तो लोकमत को सर्वोपरि नहीं माना जा सकता।</p>
<p>प्रशांत भूषण एक जाने-माने वकील हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि हमारे देश का लोकतंत्र यहां के संविधान के आधार पर चलता है और हमारा संविधान राष्ट्रीय एकता, अखंडता और प्रभुसत्ता पर सौदेबाजी की इजाजत किसी सरकार को नहीं देता। यदि कोई सरकार भारत के अस्तित्व के बारे में सौदेबाजी या समझौता करती है, तो वह स्वयं अवैध मानी जाएगी। कश्मीर के मुद्दे पर यदि कभी जनमत संग्रह की नौबत आई तो उसमें केवल जम्मू कश्मीर के लोग ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता को शामिल करना होगा। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उस पर निर्णय लेने का अधिकार जितना कश्मीर के लोगों को है, उतना ही कन्याकुमारी के या अन्य स्थानों के लोगों को भी है।</p>
<p>देश के भीतर जो बुद्धीजीवी लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर कश्मीर में जनमतसंग्रह की बात करते हैं, उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि साम्राज्यवादी और विस्तारवादी ताकतें अपने निहित स्वार्थों के लिए देशों को तोड़ने की जुगत में हमेशा लगी रहती हैं। इस काम में ‘आत्मनिर्णय’ का शगूफा उनके बड़े काम आता है। बौद्धिक विमर्श के नाम पर ऐसे विषय बड़ी चालाकी से लोगों के मन मष्तिष्क में डाल दिए जाते हैं। इसलिए तमाम बुद्धिजीवियों से मेरा आग्रह है कि वे राष्ट्रीय एकता और अखंडता से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अकादमिक बहस न चलाएं। क्योंकि इस प्रकार की बहस से राष्ट्रीय मनोबल में गिरावट आती है और हमारे अंतरविरोध बढ़ जाते हैं।</p>
<p>कश्मीर के मुद्दे पर प्रशांत भूषण ने जो भी कहा, वह गैर जिम्मेदाराना है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्होंने इस देश के करोड़ों लोगों की भावना को आहत किया है। इसके बावजूद उनका विरोध करने के लिए हिंसा और मारपीट का आश्रय लेना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। प्रशांत भूषण की स्थापना से सौ प्रतिशत असहमत होने के बावजूद उनके साथ किए गए व्यवहार की मैं घोर निंदा करता हूं।</p>
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		<title>दुनिया को बदलना होगा</title>
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		<pubDate>Tue, 04 Oct 2011 08:14:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[David Corten]]></category>
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		<category><![CDATA[John Perkins]]></category>
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		<category><![CDATA[पश्चिमी सभ्यता]]></category>
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		<category><![CDATA[वालस्ट्रीट अमेरिका]]></category>
		<category><![CDATA[वैश्वीकरण]]></category>
		<category><![CDATA[स्टाक एक्सचेंज]]></category>

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		<description><![CDATA[बाजारवाद के रूप में जो संकट आज विश्व के सामने उपस्थित है, उसके लक्षण 20 साल पहले ही उभरने लगे थे। भारत में 1991 की नई आर्थिक नीति और डंकल ड्राफ्ट पर बहस में इसी प्रकृति विरोधी और मानव विरोधी दिशा का संकेत मिल रहा था। इन्हीं सब बातों को देखते हुए मेरे मन में अध्ययन अवकाश पर जाने की इच्छा हुई थी। समस्या की मूल प्रकृति को जानने के लिए मैं क्या पढ़ूं, यह पूछने के लिए मैं प्रयाग स्थित आजादी बचाओ आंदोलन के नेता श्री बनवारी लाल शर्मा से मिला। उन्होंने मुझे दो किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। पहली किताब थी, When Corporations Rule the World (David Corten) जिसमें मेगा कारपोरेशन्स के प्रभुत्व से उत्पन्न खतरों को बताया गया है। आज वालस्ट्रीट में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उससे इस किताब की बात सच साबित हो रही है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>वालस्ट्रीट अमेरिका की वह जगह है जहां दुनिया का सबसे बड़ा स्टाक एक्सचेंज काम करता है। पूंजीवादी जगत के लिए यह स्थान किसी मंदिर से कम नहीं। दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों का दिल यहीं से धड़कता है। पिछले दिनों यहां अमेरिका के लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। 700 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। धीरे-धीरे यह प्रदर्शन अमेरिका के दूसरे शहरों जैसे लास एंजल्स और बोस्टन में भी फैल रहा है।</p>
<p>पूंजीवादी व्यवस्था ने जो विकृतियां पैदा की हैं, अमेरिकी मंदी के चलते उन्हें ढके रख पाना मुश्किल हो रहा है। अमेरिका के समाज विज्ञानी और अर्थशास्त्री समस्या के मूल कारण को जानते हैं, किंतु उसकी तह तक जाने और उसका समाधान ढूंढने की इच्छा शक्ति उनमें नहीं है।</p>
<p>ग्लोबल वार्मिंग जैसे तमाम वैश्विक मुद्दों पर जब बातचीत होती है, तो सबकी नजर में बेलगाम अमेरिकी उपभोग की समस्या आती है, लेकिन इसका समाधान ढूंढने की बजाय अमेरिकी नेता अहंकार पूर्वक घोषणा करते हैं कि वे अमेरिकी जीवनशैली पर कोई बातचीत नहीं करेंगे। जिस ‘अमेरिकी जीवनशैली’ को वहां के नेता बातचीत से परे मानते हैं, वह वहां के आम आदमी की नहीं, बल्कि  अमेरिकी कंपनियों की चिंता करती है, उन कंपनियों के मुनाफे की चिंता करती है। इन कंपनियों के लाभ को बनाए रखने के लिए अमेरिकी सरकार कुछ भी करने को तैयार रहती है।</p>
<p>अमेरिका की देखादेखी दुनिया की अन्य सरकारें भी अपनी कंपनियों के हितपोषण में लगी हुई हैं। लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद कंपनियों की हालत बिगड़ रही है। ब्राजील जैसे देश अपने विशाल प्राकृतिक संसाधनों के कारण निर्यात की गति को बनाए हुए हैं, किंतु यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है। ग्रीस जैसे देश तो दिवालिया होने की कगार पर हैं। जर्मनी की पूरी कोशिश है कि वह यूरोपीय देशों को दिवालिया होने से बचाए, लेकिन वह कब तक ऐसा कर पाएगा?</p>
<p>कभी ऐसा माना जाता था कि महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं केवल तीसरी दुनिया की समस्याएं हैं। पर आज पहली दुनिया के देश भी इनसे जूझते नजर आ रहे हैं। उपनिवेशवाद की बुनियाद पर बनाई गई यूरोपीय सभ्यता की इमारत की दीवारें आज दरक रही हैं। अपनी 500 वर्षों की विकास यात्रा में यूरोपीय देशों ने जो माडल खड़े किए, उसका घातक परिणाम न केवल मानवता को, बल्कि संपूर्ण प्रकृति को झेलना पड़ रहा है।</p>
<p>हथियारवाद, उपनिवेशवाद, सरकारवाद के रास्ते चलते हुए पश्चिमी सभ्यता ने बदली हुई परिस्थिति में अपनी सर्वोच्चता को बनाए रखने के लिए बाजारवाद का नारा दिया। पूंजी को ब्रह्म, मुनाफा को जीवनमूल्य और उन्मुक्त उपभोग को मोक्ष बताया गया। इसके चलते मानव ‘अमानवीय’ होता गया। लाभोन्माद, भोगोन्माद को मानवजीवन का मूल मान लिया गया। पारंपरिक मानवीय मूल्य नष्ट होते गए और संवेदनशीलता कुंद होती गई।</p>
<p>बाजारवाद के रूप में जो संकट आज विश्व के सामने उपस्थित है, उसके लक्षण 20 साल पहले ही उभरने लगे थे। भारत में 1991 की नई आर्थिक नीति और डंकल ड्राफ्ट पर बहस में इसी प्रकृति विरोधी और मानव विरोधी दिशा का संकेत मिल रहा था। इन्हीं सब बातों को देखते हुए मेरे मन में अध्ययन अवकाश पर जाने की इच्छा हुई थी।</p>
<p>समस्या की मूल प्रकृति को जानने के लिए मैं क्या पढ़ूं, यह पूछने के लिए मैं प्रयाग स्थित आजादी बचाओ आंदोलन के नेता श्री बनवारी लाल शर्मा से मिला। उन्होंने मुझे दो किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। पहली किताब थी, When Corporations Rule the World (David Corten) जिसमें मेगा कारपोरेशन्स के प्रभुत्व से उत्पन्न खतरों को बताया गया है। आज वालस्ट्रीट में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उससे इस किताब की बात सच साबित हो रही है। अथाह संपत्ति की मालिक अमेरिका की कंपनियां वहां के जन के प्रति संवेदनहीन हैं, लोगों की भूख, बेरोजगारी से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी कंपनियों की यही प्रकृति है। हर कीमत पर ज्यादा से ज्यादा लाभ ही उनकी सभी गतिविधियों के मूल में है।</p>
<p>बनवारीलाल जी ने मुझे दूसरी किताब बताई थी, Enough is Enough (Davison Budhoo) इस किताब में कारपोरेट दुनिया की विकृतियों को उदाहरण सहित बताया गया है। यही बातें Globalisation and its Discontents (Nobel laureate Joseph E. Stiglitz) और Confessions of an Economic Hit Man (John Perkins) जैसी किताबों में भी पुष्ट की गई हैं।</p>
<p>दुनिया भर के समाज विज्ञानी और अर्थशास्त्री- चाहे वे दुर्खाइन हों या फुकुयामा हों, या फिर क्रुगमैन हों, पॉल ड्रकर हों, सभी ने इस विनाशकारी दिशा का संकेत दिया है। अपने-अपने स्तर पर उन्होंने विकल्प तलाशने की मुहिम भी शुरू की।</p>
<p>1998 के दक्षिण एशियाई देशों का मुद्रा संकट चीख-चीख कर दुनिया भर को आसन्न संकट की चेतावनी दे रहा था। लेकिन कारपोरेट सेक्टर और ट्रांसनेशनल कंपनियों की मुनाफाखोरी और लालच के कारण विकल्प तलाशने की आवाज को दबा दिया गया। जो लोग विकल्प की बात कर रहे थे, उन्हें विकास विरोधी करार दे दिया गया। विकास की संकल्पना के बारे में बहस को सिरे से ही नकार दिया गया और अर्थव्यवस्था को सर्वग्रासी बनाने की कोशिश चलती रही।</p>
<p>राजनीति, अर्थनीति और संस्कृति को कारपोरेट हितों के लिए निर्देशित और नियंत्रित करने की गति द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद काफी तेज हो गई। सोवियत रूस और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध के कारण इसमें जो थोड़ी-बहुत शिथिलता आई थी, वह सोवियत रूस के विखंडन के बाद दूर हो गई। एक ध्रुवीय दुनिया का दंभ पालने वाले अमेरिका ने बेरोक-टोक अपनी कारपोरेट हितैषी नीतियों को दुनिया पर थोपना शुरू किया। लेकिन यह प्रक्रिया अब अपने ही बोझ के कारण बिखर रही है।</p>
<p>भारतीय चिंतन के आलोक में एस. गुरुमुर्ति जैसे लोगों ने पश्चिमी अर्थशास्त्र की संकल्पनाओं की असफलता और असमर्थता को चिन्हित किया है। उनका कहना है कि हमें अपनी आर्थिक सोच में मूलभूत  बदलाव लाने की जरूरत है। 500 वर्षों से दुनिया में जिस आर्थिक व्यवस्था का बोलबाला रहा है, उसे बदलने के लिए एस. गुरुमुर्ति ने भारतीय चिंतन की रोशनी में अर्थनीति, राजनीति और समाजनीति के पुनर्गठन पर बल दिया है।</p>
<p>मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमें भारतीय जीवन दर्शन, जीवन लक्ष्य, जीवन मूल्य और जीवन आदर्श के अनुरूप जीवनशैली अपनानी होगी। इसके लिए अनुकूल राजनीति और अर्थनीति को परिभाषित करने और उसे साकार करने की जरूरत है। पिछले लगभग 100 वर्षों से केन्द्रीयकरण, एकरूपीकरण, बाजारीकरण और अंधाधुंध वैश्वीकरण को ही सभी समस्याओं का रामबाण इलाज माने जाने की मानसिकता से हटकर विकेन्द्रीकरण, विविधिकरण, स्थानिकीकरण और बाजार मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने से ही आज की अपसंस्कृति की सुनामी से बचा जा सकेगा। समता और एकात्मता के अधिष्ठान पर देशी सोच और विकेन्द्रीकरण को आधार बनाकर आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था का पुनर्गठन ही आज की विषम परिस्थितियों से पार पाने का रास्ता होगा।</p>
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		<title>खुदरा क्षेत्र में एफडीआई से बढ़ेगी बेरोजगारी</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Jul 2011 19:11:32 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[केएन गोविंदाचार्य]]></category>
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		<description><![CDATA[सचिवों की समिति ने इस क्षेत्र में 51 फीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने का प्रस्ताव किया है। हालांकि, इस निवेश के लिए कुछ शर्त रखने का भी प्रावधान किया गया है। इस समिति ने यह प्रस्ताव किया है कि कम से कम निवेश दस करोड़ डालर का होना चाहिए। पर इससे खुदरा क्षेत्र पर एफडीआई से पैदा होने वाले संकट कम नहीं होंगे। सरकार यह दावा कर रही है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश आने से रोजगार सृजन होगा। पर जिसे थोड़ी सी भी दूसरे देशों में खुदरा क्षेत्र में बड़े कारपोरेट घरानों के आने के असर के बारे में पता होगा वह यह बता सकता है कि यह दावा खोखला है। हकीकत तो यह है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आने से रोजगार सृजन तो कम होगा लेकिन बेरोजगारी और ज्यादा बढ़ेगी।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><strong>केएन गोविंदाचार्य</strong></p>
<p>केंद्र सरकार के सचिवों की समिति ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई की अनुमति देने को हरी झंडी दे दी है। इस बाबत अंतिम फैसला कैबिनेट को अभी लेना है। पर सचिवों की समिति ने हरी झंडी देकर खुदरा क्षेत्र को एफडीआई के लिए खोलने का रास्ता साफ कर दिया है।</p>
<p>सचिवों की समिति ने इस क्षेत्र में 51 फीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने का प्रस्ताव किया है। हालांकि, इस निवेश के लिए कुछ शर्त रखने का भी प्रावधान किया गया है। इस समिति ने यह प्रस्ताव किया है कि कम से कम निवेश दस करोड़ डालर का होना चाहिए। पर इससे खुदरा क्षेत्र पर एफडीआई से पैदा होने वाले संकट कम नहीं होंगे।</p>
<p>सरकार यह दावा कर रही है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश आने से रोजगार सृजन होगा। पर जिसे थोड़ी सी भी दूसरे देशों में खुदरा क्षेत्र में बड़े कारपोरेट घरानों के आने के असर के बारे में पता होगा वह यह बता सकता है कि यह दावा खोखला है। हकीकत तो यह है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आने से रोजगार सृजन तो कम होगा लेकिन बेरोजगारी और ज्यादा बढ़ेगी।</p>
<p>यह क्या महज संयोग है कि जिस समय अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के दौरे पर आती हैं, उसी वक्त सचिवों की समिति में खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के प्रस्ताव को मंजूरी दिला दी जाती है। खुदरा क्षेत्र में काम करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है वाल मार्ट। इस कंपनी से हिलेरी के रिश्ते किसी से छिपे हुए नहीं हैं।</p>
<p>हिलेरी क्लिंटन अपने पति बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति बनने से पूर्व वालमार्ट की निदेशक मंडल में वर्षों रही हैं और खुदरा क्षेत्र की दुनिया की इस सबसे बड़ी कंपनी से उनके रिश्ते बेहद पुराने हैं। वालमार्ट इन्हीं रिश्तों का इस्तेमाल करके भारत सरकार से खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को हरी झंडी दिलवाना चाहती है।</p>
<p>हिलेरी उस वक्त वालमार्ट के निदेशक मंडल में थीं जब उनके पति बिल क्लिंटन अलकांसस के गवर्नर थे। दुनिया के कई देशों के खुदरा कारोबार को पंगु बना देने वाली कंपनी वालमार्ट की सराहना करते हुए हिलेरी क्लिंटन ने 2004 में नेशनल रिटेल फेडरेशन को संबोधित करते हुए कहा था कि वालमार्ट के निदेशक मंडल में रहना उनके लिए बेहद अच्छा अनुभव था और इस दौरान उन्होंने काफी कुछ सीखा।</p>
<p>हिलेरी का निदेशक मंडल में रहना उनके लिए कई तरह के आर्थिक फायदे भी लेकर आया। उनके पति बिल क्लिंटन ने जो सालाना वित्तीय दस्तावेज वहां अमेरिकी सरकार को मुहैया कराए हैं उसके मुताबिक निदेशक मंडल में रहने के लिए हिलेरी को हर साल 18,000 डालर मिलते थे। इसके अलावा उन्हें हर बैठक के लिए 1,500 डालर कंपनी देती थी। अमेरिकी मीडिया में प्रकाशित कुछ खबरों के मुताबिक 1993 तक हिलेरी के पास तकरीबन एक लाख डालर मूल्य के शेयर भी आ गए थे।</p>
<p>ये तथ्य इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि अमेरिका की एक प्रभावशाली मंत्री के दुनिया के सबसे बड़ी खुदरा कंपनी से बड़े गहरे संबंध रहे हैं। इन्हीं संबंधों का इस्तेमाल भारत के खुदरा क्षेत्र में वालमार्ट की घुसपैठ को वैधानिक बनाने के लिए किया जा रहा है ताकि अमेरिकी हितों का पोषण होता रहा भले ही भारत के करोड़ो लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाए।</p>
<p>अमेरिका के इशारे पर काम करने वाली इस सरकार ने अगर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी दी तो देश में बेरोजगारी की समस्या और बढ़ेगी क्योंकि बड़ी कंपनियों के खुदरा क्षेत्र में आने से छोटी दुकानें बंद हो जाएंगी। छोटी दुकानों के बंद होने के बाद ये बड़ी कंपनियां मनमानी करेंगी और इससे देश के आर्थिक ढांचे पर नकारात्मक असर पड़ेगा। भारत में खुदरा क्षेत्र का सालाना कारोबार तकरीबन 400 अरब डालर का है और यह क्षेत्र तकरीबन 13 फीसदी की दर से विकास कर रहा है और यही वजह है कि वालमार्ट जैसी बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र पर नजर गड़ाए बैठी हैं।</p>
<p>गौरतलब है कि अकेले वालमार्ट का सालाना कारोबार तकरीबन 400 अरब डालर का है और तकरीबन 21 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इससे पता चलता है कि भारत सरकार का यह दावा बिल्कुल खोखला है कि खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के आने से बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होगा। भारत में तकरीबन चार करोड़ लोग खुदरा क्षेत्र पर आश्रित हैं। खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूंजी के आने से इन चार करोड़ लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा होने का खतरा है।</p>
<p>खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी देने से यहां के सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों का भी बहुत नुकसान होगा। इस क्षेत्र की विकास दर अभी अच्छी है लेकिन एक बार खुदरा क्षेत्र में विदेशी कारपोरेट घरानों के आ जाने के बाद इनके लिए अपना अस्तित्व बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा। पहले से ये देसी बड़ी कारपोरेट घरानों की तरफ से दी जा रही चुनौतियों से निपटने में परेशान हैं।</p>
<p>जब देश में खुदरा क्षेत्र में बड़े कारपोरेट घरानों को आने यानी संगठित रिटेल को मंजूरी दी गई थी उस वक्त भी कई लंबे-चैड़े वादे सरकार ने किए थे। कहा गया था कि इसका फायदा किसानों और ग्राहकों को मिलेगा। पर हकीकत सबने देख लिया।</p>
<p>संगठित रिटेल को भारत के लोगों ने एक तरह से खारिज कर दिया। कुछ कंपनियों को तो अपना कारोबार तक समेटना पड़ा। इसके बावजूद केंद्र सरकार अमेरिकी हितों को साधने के लिए खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को हरी झंडी देना चाहती है। ऐसा करके दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार लोक भावना का अनादर कर रही है और एक बड़ी आबादी के लिए नई तरह की मुश्किलें पैदा कर रही है। इसका हर स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए।</p>
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		<title>ओबामा की अनायास वाहवाही</title>
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		<pubDate>Tue, 16 Nov 2010 11:42:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>

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		<description><![CDATA[ऐसा नहीं है कि ओबामा ने भारत के बारे में सब अच्छा-अच्छा ही कहा है। अगर आप उनके भाषणों को गौर से देखें तो पता चलेगा कि उन्होंने बड़ी होशियारी से तारीफ के प्रत्येक वाक्यों के बाद भारत की खिंचाई भी की है। हमें नसीहत भी दी है। पाकिस्तान से कैसे संबंध् होने चाहिए, वैश्विक ताकत बनने की जिम्मेदारियां क्या-क्या होती हैं, यह सब वह हमें समझा गए, जैसे हमें यह सब नहीं मालूम। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ये वही ओबामा हैं जिनकी डेमोक्रैटिक पार्टी इस बात के लिए अभियान चला रही है कि भारतीयों को अमरीका से काम आउटसोर्स नहीं किया जाना चाहिए। ओबामा प्रशासन ने भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा फीस बढ़ा दी है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>के एन गोविंदाचार्य</p>
<p>एक बार स्टालिन ने लेनिन के स्वभाव के बारे में बताया था कि वे किसी के बारे में अच्छी राय बनाने में बहुत समय लेते थे और उस राय को अभिव्यक्त करने में उससे भी अधिक और लंबा समय लेते थे। राजनयिक संबंधो में लेनिन का यह सिदान्त आज भी आदर्श माना जाता है। लेकिन पिछले दिनों ओबामा की भारत यात्रा के दौरान अलग ही दृश्य देखने को मिला। मीडिया से लेकर नेता और नागरिक समाज के लोग, सभी ओबामा की जय-जय कार करने में व्यस्त दिखे। ओबामा ने भारत के बारे में कुछ अच्छी-अच्छी बातें क्या कह दीं, सभी यह भूल गए कि वे भारत में भारतीयों की तारीफ करने के लिए नहीं आए थे। वे यहां अमरीकियों के लिए रोजगार के अवसर ढूंढने और अपने देश की कंपनियों के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे खोलने आए थे। यदि कोई व्यक्ति देश या समाज अपनी तारीफ सुनकर इतराने लगे, तो उसे स्वस्थ नहीं माना जा सकता। हम क्या हैं, इसका आकलन हमें भी तो होना चाहिए।</p>
<p>ऐसा नहीं है कि ओबामा ने भारत के बारे में सब अच्छा-अच्छा ही कहा है। अगर आप उनके भाषणों को गौर से देखें तो पता चलेगा कि उन्होंने बड़ी होशियारी से तारीफ के प्रत्येक वाक्यों के बाद भारत की खिंचाई भी की है। हमें नसीहत भी दी है। पाकिस्तान से कैसे संबंध होने चाहिए, वैश्विक ताकत बनने की जिम्मेदारियां क्या-क्या होती हैं, यह सब वह हमें समझा गए, जैसे हमें यह सब नहीं मालूम। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ये वही ओबामा हैं जिनकी डेमोक्रैटिक पार्टी इस बात के लिए अभियान चला रही है कि भारतीयों को अमरीका से काम आउटसोर्स नहीं किया जाना चाहिए। ओबामा प्रशासन ने भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा फीस बढ़ा दी है। अमेरिका में इस बात की हर संभव कोशिश की जा रही है कि भारतीयों को वहां आने से रोका जाए।</p>
<p>अमेरिका ने पाकिस्तान से जुड़ी भारतीय आशंकाओं को कोई खास महत्व नहीं दिया है। भारत के खिलाफ पाकिस्तान में चल रहे आतंकी ढांचे को नष्ट करने के लिए अमेरिका बिल्कुल गंभीर नहीं है। पाकिस्तान अमेरिका की कमजोरी को अच्छी तरह समझता है। वह अफगानिस्तान सीमा पर दिखावे के लिए अमेरिका की मदद करता है, पर भारतीय सीमा पर उसी की मर्जी चलती है। ऐसा नहीं है कि अफगानिस्तान में सहयोग पाकिस्तान की आतंक विरोधी  नीति का हिस्सा है। यह वास्तव में अमेरिका से पैसा एंठने का एक बहुत बड़ा जरिया है। अमेरिका से प्राप्त आर्थिक सहायता का प्रयोग भारत के खिलाफ धड़ल्ले से हो रहा है। इस बात को कई अमेरिकी अधिकारी भी मान चुके हैं।</p>
<p>अमेरिकी राष्ट्रपति ने बड़ी चालाकी से भारत को चीन के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की है। वो भारत और चीन को दो प्रतिस्पर्धी देशों के रूप में स्थापित कर गए। एशिया में भारत को अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए तैयार करना अमेरिकी रणनीतिकारों की बड़ी पुरानी कोशिश है। ओबामा ने इसे आगे बढ़ाया है।</p>
<p>वास्तव में अमेरिका का व्यवहार और चाल-चलन अंग्रेज व्यापारियों की अगली पीढ़ी जैसा है। ओबामा ने अपनी यात्रा के दौरान जो आर्थिक सौदे किए हैं, उनकी जांच पड़ताल के बाद ही पता चलेगा कि वास्तव में भारत को कहां-कहां घाटा उठाना पड़ेगा। अभी जितनी जानकारी उपलब्ध् है, उसके आधार पर तो यही कहा जा सकता है कि अमेरिका ने कोरे आश्वासनों के बदले अपने पक्ष में ठोस सौदे किए हैं। अमेरिका आणविक उपकरणों की खरीद का रास्ता साफ हो गया है। न्यूक्लियर सेफ्टी बिल को अमेरिका की इच्छा के अनुसार कमजोर बना दिया गया है। थोरियम जिसकी भारत में बहुतायत है, को भावी परमाणु तकनीक में इस्तेमाल के रास्ते बंद कर दिए गए हैं। इसके बदले यूरेनियम पर निर्भरता स्वीकार कर ली गयी है जिसके लिए भारत को हमेशा विदेशी आपूर्ति का इंतजार रहेगा। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में शामिल होने के नाम पर विदेशी निगरानी तंत्र को स्वीकार कर लिया गया है, जो एक तरह से सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने जैसा ही है।</p>
<p>ओबामा की यात्रा के दौरान जिस बात की सबसे कम चर्चा हुयी, वह है जैव तकनीक पर हुआ समझौता। इस समझौते की आड़ में अमरीकी बीज कंपनियां जल्दी ही भारतीय बाजार पर कब्जे के लिए अपनी कोशिशें तेज कर देंगी। आने वाले समय में भारतीय जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा खतरा आने वाला है। हमारे कृषक बीजों के लिए अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर हो जाएंगे। यह सब उच्च तकनीक देने के नाम पर होगा। भोले-भाले किसानों को पता ही नहीं चलेगा कि पारंपरिक बीजों के रूप में उनके पास जो संपदा है, उसे निरर्थक बता कर उन्हीं के हाथों नष्ट करवाने के प्रयास किए जाएंगे।</p>
<p>भारत के हितों की बलि एक और क्षेत्र में दी गयी जिसकी कहीं चर्चा नहीं है। बड़े गुपचुप तरीके से अमेरिकी रिटेल कंपनियों को भारतीय खुदरा बाजार में प्रवेश की भूमिका तैयार कर ली गयी है। यह समझौता भी तकनीकी हस्तांतरण के नाम पर हुआ है। यह कोई बताने वाला नहीं है कि खुदरा क्षेत्र  में आने वाली उच्च तकनीक से न तो उपभोक्ताओं का लाभ होगा, न तो दुकानदारों का। खुदरा क्षेत्र  में तथाकथित उच्च तकनीक के आने से करोड़ों लोग बेरोजगार होंगे और वस्तुओं के दाम भी बढ़ेंगे, क्योंकि दानवाकार विदेशी रिटेल कंपनियों को भारतीय बाजार पर एकाधिकार स्थापित करने से रोक पाना किसी के लिए संभव नहीं।</p>
<p>अब आप ही तय करिए कि ओबामा की वाहवाही की जाए या आलोचना?</p>
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		<title>सियासी दलों का भटकाव</title>
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		<pubDate>Fri, 29 Oct 2010 03:05:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[govindacharya]]></category>
		<category><![CDATA[K N Govindacharya]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[केएन गोविंदाचार्य]]></category>
		<category><![CDATA[गरीबपरस्त]]></category>
		<category><![CDATA[भारतपरस्त]]></category>
		<category><![CDATA[मूल्यों और मुद्दे]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[सियासी भटकाव]]></category>

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		<description><![CDATA[राजनीतिक दलों का आकलन पांच बातों पर होता है। ये हैं- प्रेरणा, विचारधारा, कार्यपद्धति, व्यवहार और आचरण। इन पांच बातों को सही तरह से किसी भी दल में लागू करने के लिए सबसे जरूरी है आत्मविलोपन। अगर किसी दल में इसका अभाव हो जाता है तो वहां गड़बड़ियां स्वाभाविक हैं। वहीं अगर कोई दल इन पांच बातों को सही और सफल ढंग से साध लेता है तो वह स्वाभाविक तौर पर सामाजिक बदलाव का औजार बन जाता है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>के एन गोविंदाचार्य </p>
<p>बिहार की राजधानी पटना से सटे एक जगह के रहने वाले और अच्छी शिक्षा हासिल करने वाले एक सज्जन को लगता है कि भाजपा की कार्यपद्धति को बदला जा सकता है। इस सज्जन का सही नाम लेना यहां ठीक नहीं होगा। इसलिए सुविधा के नाते इनका नाम अनुज मान लेते हैं। इस कार्यकर्ता की इच्छा और जज्बे को देखते हुए इसे भाजपा के एक प्रकोष्ठ में कोई काम दे दिया गया है।</p>
<p> अनुज अकेले ऐसे कार्यकर्ता नहीं हैं जिन्हें यह लगता है कि मौजूदा भाजपा को वापस मूल्यों और मुद्दों पर वापस लाकर इस राजनीतिक तंत्र के जरिए कोई सकारात्मक बदलाव किया जा सकता है। जमीनी स्तर पर अनुज की तरह हजारों कार्यकर्ता इस भावना के साथ अब भी जी रहे हैं। पर वे नेतृत्व और दिल्ली की स्थितियों से गाफिल मालूम पड़ते हैं।</p>
<p>दरअसल, राजनीतिक दलों का आकलन पांच बातों पर होता है। ये हैं- प्रेरणा, विचारधारा, कार्यपद्धति, व्यवहार और आचरण। इन पांच बातों को सही तरह से किसी भी दल में लागू करने के लिए सबसे जरूरी है आत्मविलोपन। अगर किसी दल में इसका अभाव हो जाता है तो वहां गड़बड़ियां स्वाभाविक हैं। वहीं अगर कोई दल इन पांच बातों को सही और सफल ढंग से साध लेता है तो वह स्वाभाविक तौर पर सामाजिक बदलाव का औजार बन जाता है।</p>
<p>पर दुर्भाग्य से आज के ज्यादातर दलों में इसका अभाव दिखता है। भाजपा भी इसका अपवाद नहीं है। जिस दल में इन बातों का अभाव हो जाए उसका किसी राष्ट्रीय महत्व के लक्ष्य को पूरा करने में कोई उपयोग नहीं रह जाता। ऐसे दल तो एक तरह से देखा जाए तो आर्थिक और सामाजिक हैसियत बढ़ाने का जरिया बनकर रह जाते हैं।</p>
<p>देश के सभी दलों को अगर देखा जाए तो भाजपा और वाम दलों से ही सामाजिक बदलाव की मुहिम और राष्ट्र को सही दिशा में ले जाने की उम्मीद बंधती थी। इसमें से भी भारतीय जन और भारतीयता से जुड़ाव के कारण संघ परिवार से ज्यादा उम्मीद थी। पर ये दोनों दल भगवा और लाल कांग्रेस में तब्दील होकर रह गए हैं।</p>
<p>इसमें भाजपा का भटकाव सबसे ज्यादा हताशा पैदा करने वाला है। भाजपा में नीचे यानी कार्यकर्ता स्तर पर देखने पर पता चलता है कि वहां अब भी देववाद और आदर्शवाद मजबूती से बना हुआ है। वहीं ऊपर के स्तर पर स्वार्थ, सत्ता और अहंकार का टकराव आए दिन दिखता रहता है। कहा जा सकता है कि स्वार्थ, सत्ता और अहंकार के खेल में जुटे लोगों के लक्ष्य और दिशा सामाजिक न होकर व्यक्तिगत हो गए हैं।</p>
<p>नेताओं के व्यावसायिक हित नेताओं पर अब हावी हो चले हैं। बेशुमार दौलत और बेनामी संपत्तियों की सुरक्षा, नेताओं की आवश्यकता बन चुकी है। यह तो एक अंतहिन परिणाम की हविश मात्र है। ऐसे में नेता राजनीति का अपने दौलत की रक्षा के लिए कवच के नाते इस्तमेाला करें यह लाजिमी है। बेनामी संपत्तियां हाथ से न निकल जाएं इसके लिए राजनैतिक अधिकार नेताओं की जरूरत बन जाते हैं।</p>
<p>आर्थिक आरे राजनैतिक हित का यह घालमेेल वंशवाद को जन्म देता है और उसे पुख्ता करता है। इसलिए आर्थिक और राजनैतिक विरासत परिवार में बनी रहे, ये अब राजनेताओं की जरूरत बन चुकी है। इसलिए भाजपा समेत प्रमुख राजनैतिक दलों में वंशवाद जड़ जमा चुका है। इसकी छटा प्रदेशों में और कुछ-कुछ केंद्र में भी दिखने लगी है।</p>
<p>ऐसे समय में स्वर्गीय नानाजी देशमुख का अनुभव काम आता है। एक बार राज्यसभा चुनाव में जब एक उद्योगपति के उत्तर प्रदेश से चुनाव मैदान में उतरने की बात सामने आई तो नानाजी ने लखनऊ में छात्रों और नौजवानरों को प्रेरणा दी कि वे राजनीति में बढ़ते धनबल के प्रभाव की रोकथाम के लिए सामने आएं और छात्रों और नौजवानों का वह प्रयोग सफल भी रहा।</p>
<p>देश के सभी प्रमुख औद्योगिक घरानों से नानाजी का रसोई तक संपर्क था और कालाधन राजनीति में अपरिहार्य रहने के कारण नानाजी मजबूरन उनसे चंदा लेते थे मगर उन्होंने एक परहेज हमेशा पाले रखा। उन्होंने कभी किसी उद्योगपति को पार्टी का प्राथमिक सदस्य भी नहीं बनाया। हां, घरेलू रिश्ता जरूर बरकरार रखा। आज उद्योग घरानों के लोग राजनीति में गहरी पैठ जमा चुके हैं और राजनैतिक दलों को जेब में रखने की डींग भी हांकते रहते हैं। भाजपा उसमें अपवाद नहीं है।</p>
<p>भाजपा का सामान्य कार्यकर्ता जहां देश के बारे में सपना पाले हुए है वहीं भाजपा नेतृत्व का अधिसंख्य हिस्सा साजिश, तिकड़म और चापलूसी की कार्यपद्धति अपनाकर खुद के लिए महत्वकांक्षी सपने पाल रहा है और घरेलू महाभारत कर रहा है। अनेक उद्योग घरानों के हित संरक्षण में जुटे नेता उन उद्योगपतियों के मोहरों के नाते वर्चस्व स्थापना की गुटबाजी बढ़ा रहे हैं और एक दूसरे पर खबरें प्लांट कराने का आरोप जड़ रहे हैं।</p>
<p>राम मनोहर लोहिया ने बहुत पहले कहा था कि सुधरो या टूटो। इससे साफ है कि टूट की परवाह किए बिना अज्ञान में कूदना ही परिष्कार की पूर्व शर्त है। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह साहस भी सब में नहीं होता। पर राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य के साथ निकले लोगों और दलों में तो सार्वजनिक हित को सर्वोपरी रखते हुए ऐसा करने का साहस होना ही चाहिए।</p>
<p>सही मायने में देखा जाए तो आज की स्थिति का तकाजा यही है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि क्या अनुज जैसे कार्यकर्ता इस बात को समझ पाएंगे? अभी की स्थिति पर निगाह दौड़ाई जाए तो साफ तौर पर यह अनुभव होगा कि निहित स्वार्थों को साधने के लिए यथास्थिति को बरकरार रखने का जोर हर ओर है। इसके पक्षधर लोग राष्ट्र निर्माण में टूट-फूट को खतरा बताएंगे और यथास्थिति बरकरार रखेंगे। इसके अलावा अंदर के प्रहार की स्थिति को भी भोथरा बनाए रखेंगे।</p>
<p>ऐसे में स्वाभाविक तौर पर जड़ता पैदा होगी और यह आखिरकार सड़ांध में बदलेगी। मूल्यों और मुद्दों से भटके इन जड़ दलों की सरकार भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान बना रही है। वहीं दूसरी तरफ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच की दीवार दिनोंदिन और मजबूत व चौड़ी होती जा रही है। बदहाली का आलम यह है कि आज नेताओं को उनके द्वारा बुनी गई छवि के जरिए ही कार्यकर्ता जान पा रहे हैं। जमीनी स्तर का कार्यकर्ता अपने नेता के व्यवहार, आचरण और प्राथमिकता से गाफिल होकर जी-जान लगाए हुए है।</p>
<p>अनुज सरीखे कार्यकर्ताओं का सपना साकार हो इसके लिए पैबंद नहीं भगीरथ साधना की आवश्यकता है जिससे भारतपरस्त और गरीबपरस्त राजनैतिक वज्र गढ़ा जा सके। इसके लिए दधीचियों का अस्थिदान महत्वकांक्षी नेताओं की खुराक न बने इसका ध्यान आज के दधीचियों को ही रखना पड़ेगा।</p>
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		<title>खुदरा क्षेत्र पर खतरे के बादल</title>
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		<pubDate>Tue, 14 Sep 2010 09:32:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व व्यापार]]></category>

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		<description><![CDATA[ पिछले साल जून से इस साल सितंबर के बीच के पंद्रह महीनों में परिस्थितियों में क्या बदलाव आ गया कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का विरोध कर रहे आंनद शर्मा इसके पक्ष में उतर गए हैं? श्री शर्मा ने इतना ही नहीं किया बल्कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का विरोध कर रहे लोगों को स्केयर मोंगर्स (आतंक फैलाने वाला) करार दिया।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>केंद्र सरकार खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी देने की योजना पर काम कर रही है और इससे देश के खुदरा और असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे करोड़ो लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाएगा। केंद्र सरकार की इस योजना का पता इसी बात से चलता है कि बीते सप्ताह केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में जाकर यह घोषणा की कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के आने से लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और इस क्षेत्र का विकास होगा।ये वही आनंद शर्मा हैं जिन्होंने पिछले साल जून में यह कहा था कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की कोई जरूरत नहीं है। उस समय आनंद शर्मा का दिया गया यह बयान जून 2009 के पहले सप्ताह के प्रमुख अखबारों में अभी भी देखा जा सकता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर पिछले साल जून से इस साल सितंबर के बीच के पंद्रह महीनों में परिस्थितियों में क्या बदलाव आ गया कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का विरोध कर रहे आंनद शर्मा इसके पक्ष में उतर गए हैं? श्री शर्मा ने इतना ही नहीं किया बल्कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का विरोध कर रहे लोगों को स्केयर मोंगर्स (आतंक फैलाने वाला) करार दिया। केंद्र सरकार ने मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में इस क्षेत्र में विदेशी निवेश के पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक समिति का गठन किया था जिसमें विभिन्न पार्टियों के सांसद शामिल थे और इस समिति ने अपनी रपट में साफ तौर पर यह कहा था कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति देने से छोटे खुदरा कारोबारी अपनी रोजी-रोटी गंवाएंगे और बेरोजगारों की फौज में और इजाफा होगा।</p>
<p>आनंद शर्मा के विचारों में इस बदलाव को केंद्र सरकार की अमेरिकापरस्त नीतियों का परिणाम कहा जा सकता है। मालूम हो कि नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत दौरे पर आने वाले हैं और इससे पहले अमेरिकी कंपनियों और खास तौर पर वालमार्ट को वैधानिक प्रवेश दिलाने के लिए खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति देने की हड़बड़ी दिखाई जा रही है। केंद्र सरकार का परमाणु दायित्व विधेयक को आनन-फानन में पारित करवाना, अमेरिकापरस्त नीतियों का एक बड़ा उदाहरण है। इस बात से लोग वाकिफ है कि परमाणु दायित्व विधेयक में भारत के लोगों के हितों की अनदेखी की गई और अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के मकसद से इस विधेयक को पारित कराने के लिए पक्ष-विपक्ष एक हो गए। कुछ ऐसी ही कोशिश खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को अनुमति देने के मसले पर भी हो रही है।</p>
<p>भारत के खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को अनुमति दिए जाने की पूरी योजना को राजनीतिक और कॉरपोरेट गठजोड़ के सहारे आगे बढ़ाया जा रहा है। यह जानकर कई लोगों को हैरानी हो सकती है कि अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन अपने पति बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति बनने से पूर्व वालमार्ट की निदेशक मंडल में वर्षों रही हैं और खुदरा क्षेत्र की दुनिया की इस सबसे बड़ी कंपनी से उनके रिश्ते बेहद पुराने हैं। वालमार्ट इन्हीं रिश्तों का इस्तेमाल करके भारत सरकार से खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को हरी झंडी दिलवाना चाहती है। हिलेरी उस वक्त वालमार्ट के निदेशक मंडल में थीं जब उनके पति बिल क्लिंटन अलकांसस के गवर्नर थे। दुनिया के कई देशों के खुदरा कारोबार को पंगु बना देने वाली कंपनी वालमार्ट की सराहना करते हुए हिलेरी क्लिंटन ने 2004 में नेशनल रिटेल फेडरेशन को संबोधित करते हुए कहा था कि वालमार्ट के निदेशक मंडल में रहना उनके लिए बेहद अच्छा अनुभव था और इस दौरान उन्होंने काफी कुछ सीखा।</p>
<p>हिलेरी का निदेशक मंडल में रहना उनके लिए कई तरह के आर्थिक फायदे भी लेकर आया। उनके पति बिल क्लिंटन ने जो सालाना वित्तीय दस्तावेज वहां अमेरिकी सरकार को मुहैया कराए हैं उसके मुताबिक निदेशक मंडल में रहने के लिए हिलेरी को हर साल 18,000 डॉलर मिलते थे। इसके अलावा उन्हें हर बैठक के लिए 1,500 डॉलर कंपनी देती थी। अमेरिकी मीडिया में प्रकाशित कुछ खबरों के मुताबिक 1993 तक हिलेरी के पास तकरीबन एक लाख डॉलर मूल्य के शेयर भी आ गए थे। ये तथ्य इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि अमेरिका की एक प्रभावशाली मंत्री के दुनिया के सबसे बड़ी खुदरा कंपनी से बड़े गहरे संबंध रहे हैं। इन्हीं संबंधों का इस्तेमाल भारत के खुदरा क्षेत्र में वालमार्ट की घुसपैठ को वैधानिक बनाने के लिए किया जा रहा है ताकि अमेरिकी हितों का पोषण होता रहा भले ही भारत के करोड़ो लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाए।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि बीते आठ जुलाई को केंद्र सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी देने के लिए एक मसौदा तैयार करके बंटवाया है और इस पर सुझाव आमंत्रित किए हैं। केंद्र सरकार की योजना इस प्रस्ताव को संसद के शीतकालीन सत्र से पहले कैबिनेट के जरिए मंजूरी दिलवाने की है। ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी इस मसले पर कुछ करने को नहीं बचेगा क्योंकि सरकार इसे नीतिगत मसला बताकर न्यायपालिका को बाहर कर देगी। खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दिलाने के लिए राजनीतिक लामबंदी के काम में सियासी लोग और कॉरपोरेट घराने लगे हुए हैं। इस मसले पर भी पक्ष-विपक्ष के लोगों को एकमत करने की कोशिश हो रही है। ताकि कैबिनेट के जरिए इसकी मंजूरी देने के बाद विपक्ष हो-हल्ला नहीं करे।</p>
<p>अमेरिका के इशारे पर काम करने वाली इस सरकार ने अगर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी दी तो देश में बेरोजगारी की समस्या और बढ़ेगी क्योंकि बड़ी कंपनियों के खुदरा क्षेत्र में आने से छोटी दुकानें बंद हो जाएंगी। छोटी दुकानों के बंद होने के बाद ये बड़ी कंपनियां मनमानी करेंगी और इससे देश के आर्थिक ढांचे पर नकारात्मक असर पड़ेगा। भारत में खुदरा क्षेत्र का सालाना कारोबार तकरीबन 400 अरब डॉलर का है और यह क्षेत्र तकरीबन 13 फीसदी की दर से विकास कर रहा है और यही वजह है कि वालमार्ट जैसी बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र पर नजर गड़ाए बैठी हैं। गौरतलब है कि अकेले वालमार्ट का सालाना कारोबार तकरीबन 400 अरब डॉलर का है और तकरीबन 21 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। जबकि भारत में तकरीबन चार करोड़ लोग खुदरा क्षेत्र पर आश्रित हैं। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी देने से यहां के सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों का भी बहुत नुकसान होगा। इस क्षेत्र की विकास दर अभी अच्छी है लेकिन एक बार खुदरा क्षेत्र में विदेशी कॉरपोरेट घरानों के आ जाने के बाद इनके लिए अपना अस्तित्व बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा। पहले से ये देसी बड़ी कॉरपोरेट घरानों की तरफ से दी जा रही चुनौतियों से निपटने में परेशान हैं।</p>
<p>खुदरा क्षेत्र पर हो रहे इस सुनियोजित हमले के खिलाफ कई सामाजिक और कारोबारी संगठन एकजुट हो रहे हैं और इनमें से कई ने हाल के दिनों में उनसे संपर्क किया है। इन संगठनों को साथ लेकर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को रोकने के लिए इस संवेदनहीन सरकार के खिलाफ एक मुहिम चलाने की जरूरत है क्योंकि यह मामला लाखों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ है। खुदरा क्षेत्र पर जब देसी संगठित रिटेल ने हमला किया था तो उस वक्त कई राज्यों में विरोध-प्रदर्शन हुआ था। इस बार तो उससे भी कहीं ज्यादा विरोध की जरूरत है क्योंकि इस दफा तो देसी-विदेशी खिलाड़ी सब एक हो गए हैं।</p>
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		<title>संघ यात्रा : एक विहंगम दृष्टि</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Feb 2010 05:55:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[दस्तावेज]]></category>
		<category><![CDATA[गोविन्दाचार्य]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]]></category>

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		<description><![CDATA[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज परिवर्तन के क्षेत्र में पिछली सदी में एक महत्वपूर्ण एवं अभिनव प्रयोग है। संघ के संस्थापक परम पूजनीय डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने गांधी जी के समान ही आजादी के लिए लड़ाकों का एक अनोखा संगठन तैयार किया। साथ ही उनमें आजादी के बाद की समाज-संरचना और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए राष्ट्रवाद पर आधारित नये-नये प्रयोग करने का संस्कार भी डाला।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><span style="color: #000000;">के. एन. गोविन्दाचार्य </span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज परिवर्तन के क्षेत्र में पिछली सदी में एक महत्वपूर्ण एवं अभिनव प्रयोग है। जहां महात्मा गांधी ने देश की आजादी के लिए राजा और रंक, अमीर और गरीब सभी को आंदोलित एवं संगठित कर देश के कोने-कोने से अंग्रेजों को भगाकर आजाद होने की ललक जगा दी।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने गांधी जी के समान ही आजादी के लिए लड़ाकों का एक अनोखा संगठन तैयार किया। साथ ही उनमें आजादी के बाद की समाज-संरचना और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए राष्ट्रवाद पर आधारित नये-नये प्रयोग करने का संस्कार भी डाला।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में समाज के अन्य सक्रिय लोगों को साथ लेकर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का जो प्रयास कर रहे हैं उसके बीज संघ के प्रारंभ के 15 वर्षों में ही पड़ गये थे। इस बात को दत्तोपंत ठेंगड़ी द्वारा लिखित पुस्तक ‘संकेत रेखा’ में पढ़कर जाना जा सकता है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">देश की आजादी के बाद जब संघ चलाने वाले शीर्षस्थ कार्यकर्ताओं में यह चर्चा होने लगी कि आजादी हासिल करने  के उद्देश्य से संगठन की रचना हुई थी और अब चूंकि आजादी मिल गई है तो संघ के कार्य का स्वरूप कैसा होना चाहिए? इस चर्चा का सूत्रपात गुरुजी के पश्चात बने सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने 30 दिसम्बर 1947 को नागपुर से प्रकाशित एक अखबार में अपने लेख ‘संघ कार्य के अगले कदम’ लिखकर की थी।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इस लेख के माध्यम से उन्होंने यह विचार व्यक्त किया था कि आजादी के बाद संघ के स्वयंसेवक समाज के लोगों को साथ लेकर आवश्यकतानुसार नये-नये संगठन खडे क़रते हुए राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के काम में भी लगें। उस लेख के आधार पर संघ में चर्चा होती और कोई कार्ययोजना तैयार होती, उससे पहले ही यानी लेख के एक महीने बाद 30 जनवरी 1948 को बापू की हत्या हो गयी।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">तत्कालीन सत्ताधीशों ने इस दुखद घड़ी का राजनैतिक शोषण किया और 4 फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। परिणामस्वरूप उस लेख की विषय-वस्तु पर चर्चा नहीं हो पाई। मगर लेख की भावना के अनुरूप उस प्रतिबंध काल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के रूप में स्वयंसेवकों ने रचनात्मक और आन्दोलनात्मक गतिविधियां शुरू भी कीं।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">मगर व्यवस्थित रूप से यह प्रयास आकार लेता और पूरे भारत में यह चीज दोहराई जाती उससे पहले ही 12 जुलाई 1949 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। यह संयोग ही है कि प्रतिबंध हटने के तीन दिन पूर्व ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को रजिस्ट्रेशन नम्बर मिल गया था।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">प्रतिबंध हटने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ढांचे को दुरुस्त करना सबकी प्राथमिकता थी। गांधी हत्या को राजनैतिक औजार के रूप में सत्ताधीशों ने इस्तेमाल किया था और इस कारण संघ के कार्य के विस्तार में कठिनाई हो रही थी। स्वयंसेवकों को हर जगह सफाई देनी पड़ रही थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गांधीजी की हत्या में कोई हाथ नहीं था। लेकिन प्रतिबंध की अग्निपरीक्षा से संघ और तप कर निकला और कार्य विस्तार की कठिन चढ़ाई शुरू हुई।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इसी दौरान संघ के आगामी स्वरूप के बारे में बहस खड़ी हुई जिसमें तीन धाराएं थीं-</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(1)</strong> संघ को अब रचनात्मक कार्यों में जुट जाना चाहिए। शिक्षा और सेवा पर जोर देना चाहिए।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(2)</strong> संघ पर गांधीजी की हत्या के अन्यायपूर्ण आरोप के विरोध में कोई भी राजनैतिक दल सामने नहीं आया था। इस अनुभूति से दुखी कार्यकर्ताओं ने यह विचार प्रकट किया कि संघ को एक राजनैतिक दल के रूप में सामने आना चाहिए।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(3)</strong> राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दैनिक शाखा पर ही जोर देगा। पहले एवं दूसरे विकल्पों में नहीं ढलेगा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">साल-डेढ़ साल की बहस के बाद यह निर्णय हुआ की संघ तीसरा रास्ता अपनाएगा। इसी बीच देश के राजनीतिक वातावरण में जो हलचल चल रही थी, उसमें हिंदुत्वनिष्ठ राजनीतिक दल समय की आवश्यकता थी। उसको पूरा करने के लिए स्वर्गीय डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संघ के तत्कालीन सर संघचालक परम पूजनीय गुरुजी से इस विषय में सलाह की।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">गुरुजी ने उनके प्रयास को बल प्रदान करते हुए उनकी मदद के लिए कुछ कार्यकर्ताओं को उनके साथ लगाया। परिणामस्वरूप अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजनीति से अलिप्त रहते हुए संघ शाखा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण से राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की दिशा में बढ़ने के लिए संकल्पबद्ध था। उस समय की राजनीतिक स्थिति को देखा जाए तो भारतीय जनसंघ ही एक ऐसा राजनैतिक दल था जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता था। बाकी अन्य दल तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोर निंदक एवं विरोधी थे। इसलिए संगठन के निर्णय या निर्देश से नहीं बल्कि तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों के कारण संघ के सामान्य स्वयंसेवको का रूझान जनसंघ की ओर रहा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">1952, 1957, 1962, 1967 और 1971 तक के विधानसभा व लोकसभा चुनावों में गुरुजी ने इस बात पर पूरा जोर दिया कि संघ का दायित्व लिए हुए लोग किसी भी दल के चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका न निभाएं। शाम को लगने वाली शाखा, जिनमें स्कूल और कालेज के विद्यार्थी ही उपस्थित होते थे, को निर्देशित किया जाता रहा कि वे एकाग्र होकर शाखा वृद्धि की ओर ही ध्यान दें। चुनाव प्रचार से अलग रहें।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इसी काल खंड में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अतिरिक्त सरस्वती शिशु मंदिर, मजदूर संघ, हिन्दुस्तान समाचार प्रकाशन संस्था, विश्व हिन्दू परिषद आदि संस्थाएं आकार लेती गईं। इस संपूर्ण काल खंड में 1967 तक जनसंघ के साथ गुरुजी का दीनदयाल उपाध्याय के माध्यम से संवाद चलता रहा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">गुरुजी वर्ष में दो बार पंडित दीनदयाल उपाध्याय से विचारधारा, कार्यपद्धति और आचरण के संदर्भ में अपनी जानकारियां तथा अनुभव अवश्य बांटते थे। साथ ही राष्ट्रीय स्थिति, राजनैतिक स्थिति और अन्य दलों से संवाद आदि महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी विचार-विमर्श करते थे।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">भारतीय जनसंघ का 1951 से 1966 तक का समय वैकल्पिक विचारधारा व एकात्म मानववाद को निरूपित एवं प्रस्तुत करने में बीता। कार्यकर्ताओं के सामान्य आचरण को आदर्शवाद का पुट मिले, इस पर भी कुछ ध्यान दिया गया। मगर जिस प्रकार विद्यार्थी परिषद एवं मजदूर संघ अपने-अपने कार्य क्षेत्र के स्वभाव, वैशिष्टय और विकार की पहचान करते हुए वैज्ञानिक कार्यशैली विकसित करने में लगे थे, वहीं किन्हीं कारणों से राजनैतिक क्षेत्र में भारतीय जनसंघ में उपयुक्त वैज्ञानिक कार्यशैली का विकास नहीं हो सका।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">फलत: वैचारिक, सांगठनिक, राजनैतिक और चुनावी पहलुओं के बीच संतुलन बिगड़ता गया। केवल चुनावी पहलू ही मानस पर हावी होता गया। इसका नतीजा यह निकला कि गुरुजी की प्रेरणा से पंडित दीनदयाल द्वारा प्रतिपादित दस्तावेज ‘एकात्म मानववाद’ को पार्टी के अन्दर ही पर्याप्त महत्व नहीं मिल सका। उसे पार्टी की नीतियों के अधिष्ठान के नाते स्थापित नहीं किया जा सका। पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा रचित पुस्तक ‘भारतीय अर्थनीति- विकास की दिशा’ की संगठन में विस्तृत चर्चा नहीं की गयी। पार्टी ने इस किताब को दुबारा छपवाने की भी जरूरत नहीं महसूस की।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इसी बीच 1967 के चुनावों में गैर-कांग्रेसवाद को अप्रत्याशित सफलता मिली और बेमेल गठबंधन की सरकारें अस्तित्व में आ गईं। आया राम गया राम की प्रवृत्ति, सिद्धांतहीनता, अवसरवाद एवं सत्ता प्रेरित गठबंधन जैसी बातें राजनीति की मुख्यधारा बन गईं।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इन सब बातों पर गहराई से विचार हो, आदर्शवाद के संरक्षण हेतु संघ और जनसंघ के संबंधों को वैज्ञानिक आधार मिले, इस दिशा में शीर्ष नेतृत्व बढ़ने ही वाला था कि 11 फरवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या हो गई। उनका शव मुगलसराय स्टेशन पर पाया गया।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">संघ के लोगों ने तो अपनी विचारधारा के संप्रेषण हेतु और नये संपर्क बढ़ाने हेतु जनसंघ की रचना में सहयोग दिया था। संघ और जनसंघ के बीच संवाद गुरुजी एवं दीनदयाल के माध्यम से ही होता था। पंडित दीनदयाल की मृत्यु के बाद जनसंघ की कार्यपद्धति को वैज्ञानिक स्वरूप देने का कार्य कठिन हो गया। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य में उत्तरोत्तर प्रगति हो रही थी।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">असम, बंगाल, बिहार, केरल, राजस्थान, दिल्ली सरीखे प्रांतों में तेजी से काम का विस्तार हुआ। मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद भी तेजी से बढ़ चले थे। एक राजनीतिक संगठन होने के कारण जनसंघ को संघ के शीर्ष नेतृत्व से सतत् मार्गदर्शन की विशेष आवश्यकता थी। लेकिन अपने तमाम अनुषांगिक संगठनों को आगे बढ़ाने में संघ इतना व्यस्त रहा कि वह जनसंघ की आवश्यकताओं पर चाह कर भी विशेष ध्यान नहीं दे पा रहा था।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">पंडित दीनदयाल की जनसंघ में भूमिका माला में धागे जैसी थी। उनके जाने के पश्चात माला के मणि बिखरने लगे। एक टीम की बजाय टीम में कई ध्रुव बन गये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी कार्य वृद्धि में व्यस्त होने के कारण जनसंघ की समस्याओं के प्रति उदासीन रहने लगा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इसी दौरान गुरुजी कैंसर की बीमारी से ग्रस्त हुए और उनका आपरेशन भी हुआ। स्वाभाविक था कि मार्गदर्शक के निष्क्रिय हो जाने के कारण जनसंघ दिशा भ्रम, अव्यवस्था और अनुशासनहीनता का भी शिकार हुआ।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">संघ को अपनी कार्यवृद्धि के साथ-साथ इस बात का भी ख्याल रखना था कि विद्यार्थी परिषद, मजदूर संघ आदि संगठन अपनी विचारधारा से भटक न जाएं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए गुरुजी विभिन्न अनुषांगिक संगठनों के सामने कुछ खास सुझाव रखना चाहते थे। इन सुझावों से सबको परिचित कराने के लिए देश भर से संघ के और संघ की विचारधारा से संबंध रखने वाले विभिन्न अनुषांगिक संगठनों के प्रमुख कार्यकर्ताओं को मुंबई में 1972 में पांच दिनों की अखिल भारतीय बैठक में आमंत्रित किया गया।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इस बैठक में गुरुजी की भूमिका परिवार के उस मुखिया की तरह थी जो मानो बहुत दिनों की तीर्थ यात्रा पर जा रहा हो और लौटकर न आने वाला हो, परिवार के सदस्यों को उनके लायक महत्वपूर्ण हिदायत और नसीहत देकर जाना चाहता हो। उस बैठक में वातावरण भी इसी प्रकार का था।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">हर संगठन की रिपोर्टिंग, उस पर चर्चा और गुरुजी द्वारा संक्षिप्त अभिव्यक्ति, यही उस बैठक का स्वरूप था। उसमें शामिल कार्यकर्ताओं ने जो संदेश ग्रहण किया, वो इस प्रकार था :</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(1)</strong> संघ का जोर अभियानों पर कम रहे। दैनंदिन संपर्क कार्यकर्ताओं के स्वभाव का हिस्सा बने।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(2)</strong> दैनिक शाखा और उसमें संस्कार हेतु गट पद्धति और गण पद्धति का कोई विकल्प नहीं है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(3)</strong> स्वयंसेवक एक घंटे की शाखा के अलावा शेष तेईस घंटे के जीवन में समाज के प्रति जागरुक, प्रगतिशील और सक्रिय भूमिका निभाते हुए जीएं।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(4)</strong> बैठक में विद्यार्थी परिषद के आंदोलन के उस स्वरूप की गुरुजी ने आलोचना की जिसमें कुलपतियों की कुर्सी पर छात्र नेताओं द्वारा कब्जा किया जाता हो या उनका पुतला दहन किया जाता हो। गुरुजी ने रचनाधर्मिता पर जोर दिया।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(5)</strong> गुरुजी ने विश्व हिन्दू परिषद को हिदायत दी कि वह घर वापसी और परावर्तन के प्रयासों को एकमात्र प्रमुख एजेंडा मानकर न चले। उनका कहना था कि परावर्तन के लिए लोभ और भय का सहारा न लेते हुए सहज स्नेह, संपर्क, सहानुभूति और सेवा को अपने कार्य का आधार बनाया जाए।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">बैठक में गुरुजी ने स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी और भारतीय मजदूर संघ की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यदि एक कार्यकर्ता एक क्षेत्र में ध्येयवाद और आदर्शवाद का संरक्षण और संपोषण करते हुए अपने कार्य क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्यशैली के आधार पर आगे बढ़े तो वह कार्य किस प्रकार यशस्वी हो सकता है, इसका उदाहरण दत्तोपंत ठेंगड़ी और भारतीय मजदूर संघ में देखा जा सकता है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">गुरुजी ने श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी को संघ का Thoughr Giver भी बताया। इसी प्रकार भारतीय जनसंघ पर भी चर्चा हुई। गुरुजी ने जनसंघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं को निम्न निर्देश दिए:</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(1)</strong> हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयत्व है, यह तर्क का नहीं, केवल बुद्धि का नहीं, बल्कि अखण्ड श्रद्धा का विषय है। इसके बारे में किसी भी प्रकार का संशय कार्यकर्ताओं के मन में नहीं होना चाहिए। अपने-अपने कार्यक्षेत्र के अनुसार इस संदर्भ में भाषा व शैली में कुछ भिन्नता हो सकती है। मगर अविभाज्य श्रद्धा के विषय से हम अगर हटे तो हमारी स्थिति इतो भ्रष्ट: ततो भ्रष्ट: की हो जायेगी।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(2)</strong> जनसंघ की संगठनात्मक स्थिति के बारे में उन्होंने कहा, ”एक ही तो व्यक्ति था जो असमय ही चला गया। उससे बहुत कुछ होना था।” उनका संकेत पंडित दीनदयाल उपाध्याय की तरफ था। उन्होंने आगे कहा था, ”शेष तो कंगूरे के कलश हैं। फिर भी अगर सब साथ चलें तो उस व्यक्ति के अभाव की एक सीमा तक क्षतिपूर्ति हो सकती है।”</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(3)</strong> बोगस वोटिंग और अनैतिक तरीकों से चुनाव जीतने की जल्दबाजी के तहत गलत तरीको को अपनाने की आदतों के बारे में गुरुजी का कहना था कि सत्ताधीश कांग्रेस के लोग तो नये-नये अनैतिक तरीके गढ़ते जायेंगे और यदि जनसंघ के लोग उन्हीं तरीको का अनुकरण करेंगे तो वे नम्बर 2 की ही स्थिति में ठहरेंगे। इसलिए गुरुजी का उस बैठक में आग्रह था कि जनसंघ के लोग प्रतिद्वंद्वी को अपने अखाड़े में लाकर पछाड़ना सीखें।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इन हिदायतों पर सारे संगठन कितना चले या नहीं चले, यह एक स्वतंत्र आकलन का विषय है। 5 जून, 1973 के दिन गुरुजी ने शरीर छोड़ दिया। उन्होने एक-दो मास पूर्व ही तीन पत्र लिख छोडे थे जिसमें से एक में उन्होंने अपने बाद बालासाहब देवरस को सरसंघचालक का दायित्व देने की घोषणा की थी।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">बालासाहब देवरस ने सरसंघचालक का दायित्व गुरुजी की मृत्यु के एक माह बाद नागपुर में आयोजित प्रमुख कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में ग्रहण किया।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">पहली ही बैठक में बालासाहब देवरस ने आगे की कार्यपद्धति के बारे में निम्न महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं :</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(1)</strong> चूंकि डा. हेडगेवार और गुरुजी विलक्षण व्यक्ति थे, इसलिए संबोधन में उनके नाम के आगे परम पूजनीय शब्द लगाना शोभा देता है। किंतु बालासाहब देवरस को केवल माननीय ही कहना पर्याप्त होगा। यह संबोधन भी सभी समय आवश्यक नहीं है। </span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(2)</strong> संगठन के कार्यक्रम में पहले दो सरसंघचालको के चित्र चाहे तो लगाएं। तीसरे, चौथे और पांचवें आदि के चित्र नहीं लगाए जाने चाहिए।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;"><strong>(3)</strong> अभी तक संघ की कार्यपद्धति की मूल बातो में ‘एक चालकानुवर्तित्व’ को एक महत्वपूर्ण सूत्र माना जाता था। आगे से इस शब्द का संघ शिक्षा वर्गों में तथा भाषणों में उपयोग न किया जाए। आगे टीम कार्यपद्धति ही संघ में आरूढ़ रहेगी।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">उन्होंने संघ के कार्य में समाज के वंचित वर्गों की समस्याओं के बारे में अत्यंत संवेदनशील रुख अपनाया। उन्होने कहा कि अगर अस्पृश्यता पाप नहीं है तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">1974 के बिहार आंदोलन के दौरान जब वे पटना प्रवास पर थे तो उन्होने उस समय बढ़ रही नक्सली गतिविधियों के बारे में पत्रकारों से बातचीत करते हुए टिप्पणी की, ”नक्सलवाद को केवल कानून व्यवस्था की दृष्टि से देखने से समाधान नहीं होगा, बल्कि नक्सलवाद तो सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर गैरबराबरी, विपन्न्ता और संवेदनहीनता का परिणाम है।”</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">कार्यकर्ताओं से बात करते हुए उन्होंने कहा कि बिहार आंदोलन से व्यवस्था परिवर्तन उपजना दूर की बात है। इससे अधिक से अधिक सामाजिक आत्मविश्वास और सामाजिक दण्ड शक्ति को एक स्वरूप दिया जा सकता है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">आपातकाल के अंत में जब 19 जनवरी 1977 को चुनाव कराने की घोषणा हुई तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विवेकानंद केन्द्र के संस्थापक एकनाथ रानाडे के माध्यम से यरवदा जेल में बालासाहब देवरस के पास एक संदेश भेजा। संदेश में कहा गया था कि यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चुनाव से अपने को अलग कर ले तो चुनाव समाप्त होने के बाद संघ पर से प्रतिबंध उठा लिया जायेगा। </span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">बालासाहब देवरस ने स्वर्गीय मोरोपंत पिंगले के द्वारा संदेश भिजवाया कि वे संकट में साथियो को मझधार में नहीं छोड़ेंगे। उनके साथ चुनाव में भागीदारी करेंगे। चुनाव पश्चात उत्पन्न स्थितियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिबंध के सवाल पर विचार किया जायेगा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">उन्होने 80 के दशक के प्रारंभ में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में अकेले पूरे संगठन पर हावी होते हुए आरक्षण के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराया। उन्होंने प्रतिनिधियों से कहा कि आरक्षण के औचित्य का निर्णय करते समय अपने आप को आरक्षण मांग रहे लोगों की सामाजिक, आर्थिक अवस्था में डालकर संवेदनशीलता के साथ विचार करने की जरूरत है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">उन्होंने यह भी कहा कि जो केवल जाति के आधार पर आरक्षण की बात करते हैं वे जातिवाद से ग्रस्त कहे जा सकते हैं। लेकिन जो केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करते हैं, वे अपने देश के सदियों के दुखद सामाजिक इतिहास को अनदेखा करते हैं।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इसी प्रकार 1964 में गुरुजी ने संघ के प्रात: स्मरण में महात्मा गांधी का नाम शामिल कराया था।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">80 के इस दशक से हिन्दू वोट बैंक की चर्चा चल पड़ी। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हुआ। कांग्रेस द्वारा अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद की दो नावों पर सवारी करने का खेल भी शुरू हुआ। बाद में रामजन्म भूमि आंदोलन का आरंभ व मंडल कमीशन का उभरना इसी राजनीति की सूचना देता है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इसके अलावा राजनीति के इस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करने वाली कई और घटनाएं भी घटीं। जैसे केन्द्र में 1977 के समान 1989 में सत्ता परिर्वतन होना और फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार का बिखरकर खत्म हो जाना, स्वर्गीय श्री राजीव गांधी की तमिलनाडु में स्ज्ज्म् द्वारा हत्या कर दिया जाना, उदारवाद और वैश्वीकरण की लहर का उठना।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">स्वर्गीय नरसिंहाराव द्वारा नई आर्थिक नीति को बढ़ावा देना, छ: दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचे का ध्वस्त होना, 1993 के पांच विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का हारना, 1994 के सितंबर महीने में भारत द्वारा विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता स्वीकार किया जाना तथा 1996 और 1998 में भाजपा (राजग) की सरकार का केन्द्र में सत्तारूढ़ होना।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">बालासाहब ने अपने जीवन काल में ही रज्जू भईया को सरसंघचालक घोषित कर दिया जो सन 1993 से सन 2000 तक कार्यरत रहे। उसी परम्परा का अनुसरण करते हुए रज्जू भईया ने सुदर्शन जी को स्वयं यह दायित्व सौंपकर सरसंघचालक घोषित किया। संघ कार्यपद्धति की यह अनोखी मिसाल है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इन्हीं दो दशको में राजनैतिक क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी और धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में विश्व हिन्दू परिषद का फैलाव और प्रभाव भी बढ़ा। 1990 से 2000 तक विश्व हिन्दू परिषद का कद सबसे ऊंचा था। 2000 के बाद भाजपा के प्रमुख लोगों पर संघ का प्रभाव कुछ कम होता दिखा। संघ विचार के समर्थको की नजर में भाजपा सरकार का प्रभाव बढ़ता दिखा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">संघ के विचार को आगे बढ़ाने की बजाए भाजपा के ऊपर राजनैतिक क्षेत्र में सत्ता स्वार्थ सन 1996 से विशेष रूप से हावी होने लगा। फलत: संगठन के मूल उद्देश्य मानस पटल से ओझल होने लगे। गुटबाजी, निजी अहंकार और स्वार्थपरता जैसी बीमारियां भी बढ़ती गईं। परिणाम स्वरूप ‘आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास’ जैसी स्थिति बन गई।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">इस पृष्ठभूमि में संघ के समक्ष जो तमाम चुनौतियां उपस्थित हैं, उनमें एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि विचारधारा, आचरण और कार्यपद्धति के स्तर पर राजनैतिक तंत्र को मूल्यों और मुद्दों की पटरी पर कैसे वापस लाया जाए?</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">संघ के द्वारा अनेक संगठन स्थापित करने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि सामान्य जन से संपर्क और हिन्दुत्व के विचार का संप्रेषण समाज के सभी क्षेत्रों में ये संगठन करेंगे। राजनैतिक क्षेत्र के लोग संघ के समर्थक वर्ग का सहयोग लेने में तो रुचि रखते हैं, लेकिन हिन्दुत्व का विचार और उसके अनुरूप नीतियों पर चलना उन्हें असंगत, अप्रासंगिक और बोझ लगने लगा है।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">उनकी दृष्टि में विचारधारा, साधन शुचिता और जीवन शुचिता की तुलना में सत्ता प्राप्ति और सत्ता को बचाए रखना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। फलत: राजनैतिक क्षेत्र में उत्तरोत्तर ध्येयवाद व आदर्शवाद का क्षरण होता गया। सत्ताकांक्षा, सत्तासुख और सत्तामोह अधिक हावी होता गया।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #000000;">आज हिन्दू समाज को त्रस्त कर रहे संकटो और चुनौतियों का सामना करने के साथ-साथ संघ और संघ विचार के संगठनों के समक्ष आंतरिक चुनौतियां भी जोर मार रही हैं। इसका समाधान खोजा जाना शेष है। इतिहास के अनुभव के साथ उपरोक्त यक्ष प्रश्न अब उत्तर चाहते हैं।</span></p>
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		<title>इस रिपोर्ट के लिए 17 साल!</title>
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		<pubDate>Thu, 03 Dec 2009 05:23:07 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]]></category>
		<category><![CDATA[लिब्रहान आयोग]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदू समाज]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.kngovindacharya.in/?p=174</guid>
		<description><![CDATA[जिन 68 लोगों को लिब्राहन आयोग ने 6 दिसंबर की घटना के लिए जिम्मेदार माना है, उनके नाम कितनी हड़बड़ी और लापरवाही के साथ जुटाए गए हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देवराहा बाबा का नाम भी है जिनकी मृत्यु 6 दिसंबर की घटना से बहुत पहले ही हो चुकी थी। 'दोषियों' की जो लिस्ट आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दी है उसमें कई लोगों के नाम दो-दो जगह दिए गए हैं। बद्री प्रसाद तोसनीवाल का नाम तो तीन बार दिया गया है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>के. एन. गोविंदाचार्य</p>
<p>लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होती है कि इस रिपोर्ट के लिए 17 साल! यदि इतनी हड़बड़ी, लापरवाही, कपोलकल्पना और पूर्वाग्रह के साथ यह रिपोर्ट तैयार करनी थी तो इसके लिए 17 दिन ही काफी थे। यह एक जांच रिपोर्ट कम उपन्यास ज्यादा है।</p>
<p>इसे तैयार करने में देश का 8 करोड़ रुपया खर्च हुआ है, जानकर पीड़ा होती है। इस रिपोर्ट से एक बात और साफ हो गयी कि किसी जस्टिस से जांच करवाने पर जस्टिस ही होगा, यह जरूरी नहीं है। जिस रिपोर्ट को 3 महीने में तैयार हो जाना था, उसे तैयार करने में 17 साल कैसे लगे, यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।</p>
<p>इन 17 वर्षों मे कई सरकारें आई-गयीं जिनमें भाजपा की भी सरकार थी, पर सभी ने बिना समझे-बूझे आयोग का कार्यकाल बढ़ाया। सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति अपना काम ठीक ढंग से कर रहा है या नहीं, क्या इसे सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? अभी मुख्य रूप से उन 68 नामों को लेकर चर्चा हो रही है, जिन्हें आयोग ने 6 दिसंबर की घटना के लिए जिम्मेदार माना है।</p>
<p>ये नाम कितनी हड़बड़ी और लापरवाही के साथ जुटाए गए हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देवराहा बाबा का नाम भी है जिनकी मृत्यु 6 दिसंबर की घटना से बहुत पहले ही हो चुकी थी। &#8216;दोषियों&#8217; की जो लिस्ट आयोग ने अपनी रपट में दी है उसमें कई लोगों के नाम दो-दो जगह दिए गए हैं। बद्री प्रसाद तोसनीवाल का नाम तो तीन बार दिया गया है।</p>
<p>इसके अलावा बारह नाम ऐसे हैं जिनका उल्लेख दो बार किया गया है। इस सूची में एक जगह लिखा हुआ है एडीशनल डीजीपी इंटेलिजेंस। अब सवाल उठता है कि सत्रह साल में जो आयोग एडीशनल डीजीपी इंटेलिजेंस का नाम नहीं पता कर पाया और आरोपी लोगों की सूची में नामों के दुहराव को नहीं ठीक कर पाया उससे इतने बड़े मसले की निष्पक्ष और सही जांच की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है?</p>
<p>आयोग का गठन करते समय इसे कानूनी रूप से निर्देश दिया गया था कि किसी ऐसे व्यक्ति को दोषी न ठहराया जाए जिससे पूछताछ न की गयी हो। लेकिन आयोग ने मेरे सहित कई लोगों को स्पष्टीकरण का कोई मौका दिए बिना ही दोषी ठहरा दिया है। घटना हुई 6 दिसंबर 1992 को जबकि मैं अप्रैल 1992 से लेकर अप्रैल 1993 तक तमिलनाडु में भाजपा का काम देख रहा था।</p>
<p>राममंदिर आंदोलन में मुझसे कई गुना ज्यादा सक्रिय तो सरदार बूटा सिंह थे। उनका नाम तो आयोग ने कहीं नहीं लिया। इसके अलावा राजीव गांधी का नाम देना भी आयोग भूल गया। याद रहे कि 1991 में राजीव गांधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या से ही की थी। ताला भी उन्होंने ही खुलवाया था। इसलिए असली &#8216;दोषी&#8217; तो उन्हें माना जाना चाहिए। पर आयोग इन तथ्यों से जानबूझ कर गाफिल बना रहा और अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर लोगों का नाम इस रिपोर्ट में डालता गया।</p>
<p>नरसिम्हा राव के बारे में भी आयोग की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। राजीव गांधी और नरसिम्हा राव को छोड़कर आयोग ने गुलजारी लाल नंदा पर निशाना साध लिया है। उसका कहना है कि गुलजारी लाल नंदा ने संघ नेताओं के साथ मिलकर अपने निहित स्वार्थों के लिए झगड़े को हवा दी। आयोग यह भूल गया कि गुलजारी लाल नंदा देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रह चुके थे और 1971 के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था।</p>
<p> रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। 17 साल बाद आई रिपोर्ट में इस तरह की बे-सिर पैर की बातें होंगी तो आयोग की नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। इस रिपोर्ट में एक जगह यह लिखा गया है कि मुस्लिम संगठनों और अन्य राजनीतिक संगठनों ने जोर-जोर से विरोध कर मंदिर आंदोलन को बल दिया।</p>
<p>इस बात की तो आयोग ने पड़ताल ही नहीं की कि आखिर क्यों और किस आधार पर इन संगठनों ने जोर-जोर से विरोध किया? आयोग के दोहरे रवैये का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राम जन्म भूमि आंदोलन के लोगों की छोटी-छोटी बातों से आयोग ने अपने मन और पूर्वाग्रह के हिसाब से आशय निकाला लेकिन दूसरों के बातों की अनदेखी की गई।</p>
<p>आयोग ने मंदिर आंदोलन के लोगों के बारे में यह लिखा है कि इस आंदोलन के लोग तो कहते कुछ थे लेकिन उसका आशय कुछ होता था। वहीं दूसरी तरफ आयोग को उस नेता का वह बयान याद नहीं आता जिसमें उन्होंने कहा था कि राम जन्म भूमि पर तो शौचालय बना देना चाहिए। आयोग ने कम्युनिस्टों द्वारा उस समय की जा रही जहरीली टिप्पणियों की भी अनदेखी की है। इन बातों को रिपोर्ट में जगह ही नहीं दी गई है।</p>
<p>आयोग ने पुलिस अधिकारियों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा वहां की स्थिति के हिसाब से लिए गए फैसले को भी एक खास इरादे के तहत लिया गया फैसला बताया है। जबकि आयोग ने ऐसा साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया है। इन अधिकारियों की क्षमता पर तो सवालिया निशान लगाया जा सकता था लेकिन उनकी मंशा पर सवालिया निशान लगाना आयोग के पक्षपाती रवैये को दर्शाता है।</p>
<p>आयोग ने कहा है कि किशोर उम्र के कारसेवक के साथ एक जत्था सबसे पहले कूदा और चढ़ा था। आयोग की अगंभीरता का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि सत्रह साल की जांच के बाद भी उसे यह पता नहीं लगा कि किशोर उम्र के वे कारसेवक कौन थे? आयोग ने 6 दिसंबर की घटना को पूर्वनियोजित बताया है लेकिन आयोग ने अपनी रपट में कहीं भी इस बात के लिए कोई सबूत ही नहीं दिया है।</p>
<p>आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई बातों का उल्लेख किया है, लेकिन 1990 का विवरण नहीं दिया है। अयोध्या में 30 अक्टूबर 1990 को भी कारसेवा हुई थी। उस वक्त के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यह बयान दिया था कि ढांचे पर परिंदा पर नहीं मार सकता। ऐसे बयानों के जरिए हिंदू समाज की भावनाओं के साथ किस तरह से खिलवाड़ किया गया, इसका कोई विवरण आयोग ने नहीं दिया है।</p>
<p>जवाब तो इस सवाल का भी ढूंढा जाना चाहिए था कि आखिर 6 दिसंबर की घटना हुई ही क्यों? दरअसल, 6 दिसंबर की घटना को सत्ता-व्यवस्था द्वारा दबाई गई भावनाओं के उभार का नतीजा माना जा सकता है। उसे न तो शौर्य दिवस माना जा सकता है और न ही कलंक दिवस। अगर शौर्य दिवस ही मानना हो तो 30 अक्टूबर 1990 को माना जाना चाहिए। उस दिन मुलायम सिंह की धमकियों के बावजूद अयोध्या में कारसेवा हुई थी।</p>
<p>अगर कोई समझना चाहे तो 6 दिसंबर की घटना ने कई गंभीर और गहरे संदेश दिए हैं। जो लोग आंदोलनों का नेतृत्व करते हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि जनभावनाओं को उभारना जितना आसान होता है, उसे सार्थक दिशा देना उतना ही मुश्किल। इसी के साथ भारतीय राजनीति में चल रहे अल्पसंख्यकवाद के खतरे को भी 6 दिसंबर की घटना ने उजागर कर दिया।</p>
<p>मध्यकाल में हिन्दुओं पर विदेशी हमलावरों ने जो धार्मिक अत्याचार किए, उस पर मरहम लगाने का काम न तो मुस्लिम समुदाय ने किया और न ही सरकार ने। ऐसे में हिन्दू समाज के मन में वर्षों से दबा आक्रोश कब, कैसे और कहां फूटेगा, कोई नहीं जानता।</p>
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		<title>सत्ता राजनीति की विवशताएं</title>
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		<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 05:19:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अभिमत]]></category>
		<category><![CDATA[कर्नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[केएन गोविंदाचार्य]]></category>
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		<category><![CDATA[भाजपा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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		<description><![CDATA[राजनीति में सत्ता संपत्ति और सम्मान का गठजोड़ हो गया है। पार्टी संगठन के विकास के लिए अलग मापदंड अलग हैं और सत्ता संचालन के अलग। राजनीति में सत्ता और संगठन दोनों प्रमुख तत्व हैं। समाज सत्ता और सत्ता समाज को व्याप्ती है। संगठन समाज के छोटे हिस्से को व्याप्ते हैं। सत्ता संचालन में  जन प्रतिनिधियों की पहुंच होती है। जन प्रतिनिधियों को सत्ता संचालन के स्थान पर पहुंचाने में संगठन और उसके कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका होती है। जन प्रतिनिधि बनने तक उम्मीदवारों का ज्यादा संबंध संगठन और कार्यकर्ताओं से होता है। पर जन प्रतिनिधि बनने के बाद उनका संबंध सत्ता से ज्यादा और संगठन से कम हो जाता है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>केएन गोविंदाचार्य<br />
राजनीति में सत्ता संपत्ति और सम्मान का गठजोड़ हो गया है। पार्टी संगठन के विकास के लिए अलग मापदंड अलग हैं और सत्ता संचालन के अलग। राजनीति में सत्ता और संगठन दोनों प्रमुख तत्व हैं। समाज सत्ता और सत्ता समाज को व्याप्ती है। संगठन समाज के छोटे हिस्से को व्याप्ते हैं।<br />
सत्ता संचालन में  जन प्रतिनिधियों की पहुंच होती है। जन प्रतिनिधियों को सत्ता संचालन के स्थान पर पहुंचाने में संगठन और उसके कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका होती है। जन प्रतिनिधि बनने तक उम्मीदवारों का ज्यादा संबंध संगठन और कार्यकर्ताओं से होता है। पर जन प्रतिनिधि बनने के बाद उनका संबंध सत्ता से ज्यादा और संगठन से कम हो जाता है।<br />
सत्ता में समाज के लिए प्रभावी एवं परिणामकारी विभागों का महत्व जन प्रतिनिधियों के लिए कम है। बजट की दृष्टि से मलाईदार विभागों का महत्व अधिक है। उदाहरण के तौर पर देखें तो मानव संसाधन मंत्रालय की तुलना पेट्रोलियम मंत्रालय और कोयला मंत्रालय का बजट अधिक होता है। संगठन के काम में बढऩे और जन प्रतिनिधि के सत्ता क्षेत्र में बढऩे के कारण अलग-अलग प्रकार के हैं।<br />
सामान्य जन से संगठन का साबका चुनावों में ज्यादा पड़ता है। जन प्रतिनिधियों को चुनावी जीत के बाद सामान्य जन से ज्यादा काम पड़ता है। चुने जाने तक कार्यकर्ता संगठन की पहचान बने होते हैं। जीतने के बाद जन प्रतिनिधि जनता में संगठन की पहचान बनाते हैं। समाज में उनकी पूछ बढ़ जाती है। इस कारण जन प्रतिनिधि सामान्य कार्यकर्ता न रहकर विशिष्टï हो जाता है। इस वजह से कार्यकर्ता और जन प्रतिनिधि में मनोवैज्ञानिक दुराव आ जाता है।<br />
चुनाव की प्रक्रिया और सत्ता संचालन की प्रक्रिया राजनैतिक दलों की प्रक्रिया से अलग होती है। संगठन में ध्येयवाद और आदर्शवाद अनुशासन की कसौटी होते हैं। इन दोनों कसौटियों की समझ और संतुलन बढ़ाना बहुत बड़ी समस्या और चुनौती है। इन्हीं बातों के बीच शंकर सिंह बघेला का उदाहरण याद आता है। संगठन के चुनाव में उन्होंने खुद अध्यक्ष बनने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की व्यूह रचना की थी। सदस्यता प्रभारी, चुनाव अधिकारी आदि के नियोजन में शुरू से निकटतम का सहारा लिया। अध्यक्ष बनने के बाद चुनाव में टिकट बांटने की जिम्मेदारी वाली चुनाव समिति का गठन अपने हिसाब से करवाया। अपने पसंद के लोगों को टिकट दिलाकर समानांतर धन वितरण के जरिए अनुकूल लोगों को जिताया। केशू भाई की सरकार बनने के कुछ महीनों बाद ही खजुराहो का खेल शुरू हुआ।<br />
पिछले कुछ सालों में राजनीति पर धनबल का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। इसे कर्नाटक में भाजपा सरकार पर आए संकट के संदर्भ में देखा जा सकता है। कर्नाटक में बेल्लारी के रेड्डïी बंधुओं ने वही प्रक्रिया दुहराई है। विधानसभा चुनाव के साल भर पहले से  उन्होंने भाजपा के संगठन संचालन में पैसे से भरपूर मदद की। टिकट भी अपने पसंद के लोगों को दिलवाए। कई मामलों में कहा जाए तो उन्होंने टिकट खरीदे। प्रत्याशियों को हराने और जीतने में पैसे से मदद की। चुनाव के बाद निर्दलीय और कांग्रेसी विधायकों को खरीदने में पैसे से मदद की। वे मंत्रिमंडल और विभाग के आबंटन में भी प्रभावी रहे।<br />
साल भर से वे इस योजना में लगे हुए थे कि ज्यों ही 40 विधायकों को अपने पक्ष में कर लेंगे, सत्ता पलट का खेल शुरू करेंगे। वैसा ही हुआ भी। भाजपा के लोगों ने सत्ता प्राप्ति के लिए येदियुरप्पा और अनंत कुमार में से येदियुरप्पा को प्रभावी बनाया। कभी पार्टी छोडऩे की धमकी देने वाले येदियुरप्पा ही संघ के लोगों के चहेते बन बैठे। सत्तासीन होने पर येदियुरप्पा ने संघ के लोगों को प्रसन्न करने की सफल कोशिश की। इसी प्रकार उन्होंने रेड्डïी बंधुओं को खुश रखने और लाभ पहुंचाने की जमकर कोशिश की लेकिन सत्ता स्वार्थियों के बीच नरम-गरम संबंध स्थायी हो ही नहीं सकते थे। यही वजह है कि कर्नाटक में भाजपा सरकार संकट में पड़ गई थी। यह संकट अभी अस्थायी तौर पर भले ही टल गया हो लेकिन आने वाले दिनों में सत्ता पलट का खेल वहां शुरू होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।<br />
जाहिर है कि कर्नाटक विवाद से भाजपा की प्रतिष्ठïा और मनोबल पर भी असर पड़ेगा। ऐसी समस्याओं के मूल में है कार्य पद्धति। संगठने के विकास और राजनीति के बीच बेमेलपन को समझकर समाधान की व्यवस्था न ढूंढ पाना आज भाजपा की घटी साख और घटते मनोबल का कारण है। 1996 के कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस तो सत्ता केंद्रित समूह भर रही है। भाजपा संघ के संगठनित डोर से चाहे-अनचाहे बंधी हुई है।</p>
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		<title>बस्तर का दर्द</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Oct 2009 09:18:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[गोविंदाचार्य]]></category>
		<category><![CDATA[छत्तीसगढ़]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण]]></category>
		<category><![CDATA[बस्तर]]></category>
		<category><![CDATA[स्वाभिमान आंदोलन]]></category>

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		<description><![CDATA[बस्तर में नक्सलियों का दोहरा चरित्र भी उजागर हो गया है। नक्सलियों ने अपना विस्तार ही व्यवस्था विरोध और पूंजीपतियों के विरोध के आधार पर किया है। पर बस्तर में नक्सली भी पूंजीपतियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वहां के लोगों का कहना है कि नक्सली पुलिस वालों और सरकारी संस्थाओं को निशाना तो बना रहे हैं लेकिन उद्योगपतियों के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि वहां उद्योगपतियों ने नक्सलियों से सांठगांठ कर ली है। वहां काम करने वाले लोग बता रहे हैं कि नक्सली नेताओं को इन उद्योगपतियों के द्वारा पैसा और तमाम तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p>केएन गोविंदाचार्य</p>
<p>बस्तर में काम कर रहे जन संगठनों के लोगों से पिछले दिनों मुलाकात हुई। उन लोगों ने वहां के जमीनी हालात के बारे में जो बताया उससे नक्सलियों और वाम विचारधारा के दोहरेपन की झलक मिलती है। बस्तर में बड़े-बड़े उद्योग लग गए हैं। बड़े उद्योगपतियों को वहां लाने का काम राज्य सरकार ने किया है।</p>
<p>स्पोंज आयरन और इससे जुड़े उद्योगों की वजह से वहां प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ गया है। हालत यह है कि वहां जो गोभी पैदा हो रहा है, उसका रंग लाल हो गया है। लोग वहां खुले में भोजन नहीं कर सकते हैं। ऐसा करने पर उनके खाने का रंग तुरंत लाल हो जाता है। अभी प्रदूषण की वजह से वहां के लोगों को परेशानियां तो हो ही रही हैं लेकिन आने वाले दिनों में वहां की हालत और खराब होगी। तेजी से बढ़ते प्रदूषण की वजह से आने वाले समय में वहां के लोग तरह-तरह की बीमारियों का सामना करते हुए दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।</p>
<p>हां, इस बात के लिए आश्चर्य और दुख भले ही जताया जा सकता है कि सरकार स्थिति की भयावहता के प्रति जान-बूझकर आंख बंद किए हुए है। यह सरकारी उदासीनता कई सत्ता का जन सामान्य के प्रति असंवेदनशीलता के स्तर के बढ़ते जाने की बात को साबित करती है। बस्तर के उदाहरण से एक बार फिर इस बात की पुष्टि हो गई है कि जनता के द्वारा और जनता के नाम पर चुनकर आने वाली सरकारें जनता की नुमाइंदगी करने का चाहे कितना भी राग अलापती हों लेकिन सही मायने में ये पूंजीपतियों के हितों को पोषित करने का काम कर रही हैं। पूंजीपतियों द्वारा मचाई जा रही अराजकता से अगर जनता को नुकसान भी हो रहा हो तो ये सरकारों पूंजीपतियों के साथ खड़ा होने को अपना राजधर्म मान रही हैं।</p>
<p>दरअसल, बस्तर में नक्सलियों का दोहरा चरित्र भी उजागर हो गया है। नक्सलियों ने अपना विस्तार ही व्यवस्था विरोध और पूंजीपतियों के विरोध के आधार पर किया है। पर बस्तर में नक्सली भी पूंजीपतियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वहां के लोगों का कहना है कि नक्सली पुलिस वालों और सरकारी संस्थाओं को निशाना तो बना रहे हैं लेकिन उद्योगपतियों के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि वहां उद्योगपतियों ने नक्सलियों से सांठगांठ कर ली है। वहां काम करने वाले लोग बता रहे हैं कि नक्सली नेताओं को इन उद्योगपतियों के द्वारा पैसा और तमाम तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। इस वजह से वहां के नक्सली उन उद्योगपतियों के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं जिनकी वजह से वहां की आम जनता को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p>पर सबसे दुखद यह है कि इसके बावजूद ये नक्सली आम आदमी के हमदर्द होने का ढोंग रचते हैं। आदिवासियों के हित के नाम पर नक्सली अपना हित साध रहे हैं। सही मायने में कहा जाए तो बस्तर के लोग नक्सली हिंसा और सरकारी हिंसा, दोनों की मार झेल रहे हैं। यह सब पूंजीपतियों के हित सध पाएं, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है। साफ है कि अति वामपंथियों ने अपने नेतृत्व को थैलीशाहों के हाथ में गिरवी रख दिया है।</p>
<p>यह छत्तीसगढ़ की विडंबना ही है कि आदिवासियों के कल्याण के नाम पर इस राज्य का गठन हुआ था लेकिन आदिवासियों की उपेक्षा ही सबसे ज्यादा हो रही है। सरकार पूंजीपरस्तों की चाकरी करने में ही गर्व महसूस करती है और नक्सली हथियार के मद में इस कदर मस्त हैं कि उनके लिए आदिवासियों के सुख-दुख का कोई मोल नहीं रह गया है और वे अपनी ही निजी फायदे को साधने में मशगूल हैं।</p>
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