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अभिमत

इस रिपोर्ट के लिए 17 साल!

December 3, 2009

जिन 68 लोगों को लिब्राहन आयोग ने 6 दिसंबर की घटना के लिए जिम्मेदार माना है, उनके नाम कितनी हड़बड़ी और लापरवाही के साथ जुटाए गए हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देवराहा बाबा का नाम भी है जिनकी मृत्यु 6 दिसंबर की घटना से बहुत पहले ही हो चुकी थी। ‘दोषियों’ की जो लिस्ट आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दी है उसमें कई लोगों के नाम दो-दो जगह दिए गए हैं। बद्री प्रसाद तोसनीवाल का नाम तो तीन बार दिया गया है।

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सत्ता राजनीति की विवशताएं

November 17, 2009

राजनीति में सत्ता संपत्ति और सम्मान का गठजोड़ हो गया है। पार्टी संगठन के विकास के लिए अलग मापदंड अलग हैं और सत्ता संचालन के अलग। राजनीति में सत्ता और संगठन दोनों प्रमुख तत्व हैं। समाज सत्ता और सत्ता समाज को व्याप्ती है। संगठन समाज के छोटे हिस्से को व्याप्ते हैं। सत्ता संचालन में जन प्रतिनिधियों की पहुंच होती है। जन प्रतिनिधियों को सत्ता संचालन के स्थान पर पहुंचाने में संगठन और उसके कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका होती है। जन प्रतिनिधि बनने तक उम्मीदवारों का ज्यादा संबंध संगठन और कार्यकर्ताओं से होता है। पर जन प्रतिनिधि बनने के बाद उनका संबंध सत्ता से ज्यादा और संगठन से कम हो जाता है।

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सच्ची नहीं है ये सादगी

September 22, 2009

अभी जिस तरह से सत्ता में बैठे हुए खास लोग सादगी दिखा रहे हैं, वह आम लोगों के लिए बहुत महंगी पड़ रही है। सही मायने में देखा जाए तो सादगी के फेर में खर्च तो ज्यादा ही हो रहा है। दरअसल, जो लोग सादगी की बात करने वाले लोग ही वैसी नीतियों को बढ़ावा देने का काम भी कर रहे हैं जिसकी वजह सादगीपसंद लोगों का जीना मुहाल हो गया है। ये नीतियां तो आम लोगों को मुश्किल में डालने वाली बनाते हैं लेकिन बात सादगी की करती है। ये वही लोग हैं जिन्होंने पूंजीपरस्त और बाजारवादी नीतियां बनाईं।

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जिला विकास संगम का संदर्भ एवं स्वरूप

July 7, 2009

वर्तमान व्यवस्थाओं में हमें तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों प्रकार के बदलावों के लिए संघर्ष करना होगा। इसलिए सबसे पहले अपने-अपने जिलों का अंदाज, आकलन तो कर ही लें, जिले की जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, जिले में विकास की मद में आने वाली राशि का हिसाब, जिले के राजस्व और आय का ब्यौरा, जिले का गेजेटियर, जिले की देशज ज्ञान परंपरा, जिले का अनोखापन क्या है, इन सब बातों की जानकारी एकत्रित करें

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विकास के सही मायने

July 6, 2009

भारतीय संदर्भ में विकास के साथ कुछ बुनियादी शर्त जुड़ी हैं। यहां वास्तविक विकास कार्य उसी को कहा जा सकता है जिसमें अंतिम व्यक्ति का हित सर्वोपरि रहे। जबकि आज हो रहा है इसके ठीक उलटा। आज जो नीतियां बनाई जा रही हैं, उनमें आम आदमी की बजाए पूंजीपतियों एवं प्रभावशाली समूहों के हित का ध्यान रखा जाता है।

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भारत को बहुविध आंदोलनों से गुजरना होगा

June 8, 2009

विगत वर्षों में जितना कुछ भी अच्छा और बुरा बदलाव समाज में हुआ है, उसे दूर कर अतीत के भारत की ओर लौटना न संभव है, न वांछनीय है, इसलिए क्रमेण उपयोगी निरूपयोगी तत्वों के मानक बनाकर, हुए बदलाव को स्वीकारने और नकारने की स्थितियां निर्मित करनी होंगी।

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भारत अब पुनर्रचना की बाट जोह रहा है

March 29, 2009

गत ढाई सौ वर्षों में हुए सारे प्रयोग कमोबेश विफल हुए हैं। इन प्रयोगों के परिणामस्वरूप प्रचलन में आई सारी व्यवस्थाएं बंद गली में पहुंच गई हैं या पहुंच रही हैं। समाजनीति, अर्थनीति सहित लगभग सभी व्यवस्थाओं को फिर से गढ़ने की आवश्यकता है। आज निश्चित रूप से भारत पुनर्रचना की बाट जोह रहा है। यह काम केवल सत्ता परिवर्तन से संभव नहीं है। इसके लिए हमें व्यापक धरातल पर प्रयास करना होगा।

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