October 13, 2011
प्रशांत भूषण एक जाने-माने वकील हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि हमारे देश का लोकतंत्र यहां के संविधान के आधार पर चलता है और हमारा संविधान राष्ट्रीय एकता, अखंडता और प्रभुसत्ता पर सौदेबाजी की इजाजत किसी सरकार को नहीं देता। यदि कोई सरकार भारत के अस्तित्व के बारे में सौदेबाजी या समझौता करती है, तो वह स्वयं अवैध मानी जाएगी। कश्मीर के मुद्दे पर यदि कभी जनमत संग्रह की नौबत आई तो उसमें केवल जम्मू कश्मीर के लोग ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता को शामिल करना होगा। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उस पर निर्णय लेने का अधिकार जितना कश्मीर के लोगों को है, उतना ही कन्याकुमारी के या अन्य स्थानों के लोगों को भी है।
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October 4, 2011
बाजारवाद के रूप में जो संकट आज विश्व के सामने उपस्थित है, उसके लक्षण 20 साल पहले ही उभरने लगे थे। भारत में 1991 की नई आर्थिक नीति और डंकल ड्राफ्ट पर बहस में इसी प्रकृति विरोधी और मानव विरोधी दिशा का संकेत मिल रहा था। इन्हीं सब बातों को देखते हुए मेरे मन में अध्ययन अवकाश पर जाने की इच्छा हुई थी। समस्या की मूल प्रकृति को जानने के लिए मैं क्या पढ़ूं, यह पूछने के लिए मैं प्रयाग स्थित आजादी बचाओ आंदोलन के नेता श्री बनवारी लाल शर्मा से मिला। उन्होंने मुझे दो किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। पहली किताब थी, When Corporations Rule the World (David Corten) जिसमें मेगा कारपोरेशन्स के प्रभुत्व से उत्पन्न खतरों को बताया गया है। आज वालस्ट्रीट में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उससे इस किताब की बात सच साबित हो रही है।
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