संघ यात्रा : एक विहंगम दृष्टि

February 7, 2010

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज परिवर्तन के क्षेत्र में पिछली सदी में एक महत्वपूर्ण एवं अभिनव प्रयोग है। जहां महात्मा गांधी ने देश की आजादी के लिए राजा और रंक, अमीर और गरीब सभी को आंदोलित एवं संगठित कर देश के कोने-कोने से अंग्रेजों को भगाकर आजाद होने की ललक जगा दी। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने गांधी जी के समान ही आजादी के लिए लड़ाकों का एक अनोखा संगठन तैयार किया। साथ ही उनमें आजादी के बाद की समाज-संरचना और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए राष्ट्रवाद पर आधारित नये-नये प्रयोग करने का संस्कार भी डाला।

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इस रिपोर्ट के लिए 17 साल!

December 3, 2009

जिन 68 लोगों को लिब्राहन आयोग ने 6 दिसंबर की घटना के लिए जिम्मेदार माना है, उनके नाम कितनी हड़बड़ी और लापरवाही के साथ जुटाए गए हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देवराहा बाबा का नाम भी है जिनकी मृत्यु 6 दिसंबर की घटना से बहुत पहले ही हो चुकी थी। ‘दोषियों’ की जो लिस्ट आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दी है उसमें कई लोगों के नाम दो-दो जगह दिए गए हैं। बद्री प्रसाद तोसनीवाल का नाम तो तीन बार दिया गया है।

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सत्ता राजनीति की विवशताएं

November 17, 2009

राजनीति में सत्ता संपत्ति और सम्मान का गठजोड़ हो गया है। पार्टी संगठन के विकास के लिए अलग मापदंड अलग हैं और सत्ता संचालन के अलग। राजनीति में सत्ता और संगठन दोनों प्रमुख तत्व हैं। समाज सत्ता और सत्ता समाज को व्याप्ती है। संगठन समाज के छोटे हिस्से को व्याप्ते हैं। सत्ता संचालन में जन प्रतिनिधियों की पहुंच होती है। जन प्रतिनिधियों को सत्ता संचालन के स्थान पर पहुंचाने में संगठन और उसके कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका होती है। जन प्रतिनिधि बनने तक उम्मीदवारों का ज्यादा संबंध संगठन और कार्यकर्ताओं से होता है। पर जन प्रतिनिधि बनने के बाद उनका संबंध सत्ता से ज्यादा और संगठन से कम हो जाता है।

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बस्तर का दर्द

October 2, 2009

बस्तर में नक्सलियों का दोहरा चरित्र भी उजागर हो गया है। नक्सलियों ने अपना विस्तार ही व्यवस्था विरोध और पूंजीपतियों के विरोध के आधार पर किया है। पर बस्तर में नक्सली भी पूंजीपतियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वहां के लोगों का कहना है कि नक्सली पुलिस वालों और सरकारी संस्थाओं को निशाना तो बना रहे हैं लेकिन उद्योगपतियों के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि वहां उद्योगपतियों ने नक्सलियों से सांठगांठ कर ली है। वहां काम करने वाले लोग बता रहे हैं कि नक्सली नेताओं को इन उद्योगपतियों के द्वारा पैसा और तमाम तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं।

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सच्ची नहीं है ये सादगी

September 22, 2009

अभी जिस तरह से सत्ता में बैठे हुए खास लोग सादगी दिखा रहे हैं, वह आम लोगों के लिए बहुत महंगी पड़ रही है। सही मायने में देखा जाए तो सादगी के फेर में खर्च तो ज्यादा ही हो रहा है। दरअसल, जो लोग सादगी की बात करने वाले लोग ही वैसी नीतियों को बढ़ावा देने का काम भी कर रहे हैं जिसकी वजह सादगीपसंद लोगों का जीना मुहाल हो गया है। ये नीतियां तो आम लोगों को मुश्किल में डालने वाली बनाते हैं लेकिन बात सादगी की करती है। ये वही लोग हैं जिन्होंने पूंजीपरस्त और बाजारवादी नीतियां बनाईं।

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मेरा जिला मेरा देश

September 3, 2009

जो व्यवस्था केन्द्र और राज्यों के लिए ठीक समझी गयी, उसे जिले में क्यों नहीं लागू किया गया? जिले में कार्यपालिका के सारे अधिकार जनता के प्रतिनिधि की बजाए नौकरशाह को क्यों दिए गए? यदि नौकरशाह बेहतर प्रशासक होते हैं तो राज्यों एवं केन्द्र में मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री की व्यवस्था क्यों की गयी?

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जिलों को जानने का अभियान चले

September 3, 2009

सभी लोग देश के सभी जिलों के बारे में गहराई से जाने, यह शायद संभव नहीं है। लेकिन देश के एक प्रबुद्ध नागरिक के नाते हमसे इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि हम कम से कम दो जिलों के बारे में जरूर जानें। पहले अपने जिले को अच्छे से जानें और फिर अपने राज्य के बाहर के किसी एक जिले के बारे में भी कुछ विस्तार से जानें और जानते रहने की चेष्टा करें।

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संघ भाजपा की बैसाखी के बिना भी सीधे चल सकता है

July 10, 2009

भाजपा को ये बात अच्छी तरह से समझ लेनी होगी कि प्रशासन, आर्थिक नीतियों आदि के संदर्भ में हिंदुत्व के मायने क्या हैं. उसे हर वर्ग के लोगों, समाज, रीति-रिवाज और यथार्थ से खुद को जोड़ना होगा. उसे इन सभी चीजों को साथ लेकर चलते हुए शासन का संचालन करना सीखना होगा. परिवार अपनी इस राजनैतिक शाखा से यही उम्मीद करता है.

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केंद्रीय बजट का सात प्रतिशत गांवों को मिले

July 7, 2009

आज देश की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। अत: कम से कम सात प्रतिशत राशि सीधे ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित की जाए। सभी ग्राम पंचायतों को यह राशि उनकी जनसंख्या के अनुपात में मिलनी चाहिए.

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जिला विकास संगम का संदर्भ एवं स्वरूप

July 7, 2009

वर्तमान व्यवस्थाओं में हमें तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों प्रकार के बदलावों के लिए संघर्ष करना होगा। इसलिए सबसे पहले अपने-अपने जिलों का अंदाज, आकलन तो कर ही लें, जिले की जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, जिले में विकास की मद में आने वाली राशि का हिसाब, जिले के राजस्व और आय का ब्यौरा, जिले का गेजेटियर, जिले की देशज ज्ञान परंपरा, जिले का अनोखापन क्या है, इन सब बातों की जानकारी एकत्रित करें

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